T20 World Cup 2026

20 साल बाद साथ लड़ी उद्धव-राज की जोड़ी फिर भी मिला 'निल बटे सन्नाटा', ठाकरे बंधुओं को पहले ही चुनाव में मिली शर्मनाक हार

BEST कर्मचारी सहकारी समिति चुनाव में, जो मुंबई के आगामी नागरिक चुनावों की रिहर्सल माना जा रहा था, ठाकरे बंधुओं की जोड़ी पहली ही परीक्षा में असफल रही. 

Sagar Bhardwaj

दो दशकों की कटुता, सार्वजनिक विवाद और एक-दूसरे को नीचा दिखाने के बाद, ठाकरे बंधुओं ने आखिरकार सुलह कर ली. शिवसेना (UBT) के उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के राज ठाकरे ने फैसला किया कि परिवार का सम्मान अलग-अलग रहने से बेहतर एकजुट होकर बचाया जा सकता है लेकिन, इस भव्य मिलन का कोई पॉजिटिव रिजल्ट नहीं निकला. BEST कर्मचारी सहकारी समिति चुनाव में, जो मुंबई के आगामी नागरिक चुनावों की रिहर्सल माना जा रहा था, ठाकरे बंधुओं की जोड़ी पहली ही परीक्षा में असफल रही. 

पहले चुनाव में ही मिली करारी हार

बेस्ट कर्मचारी सहकारी ऋण सोसाइटी चुनावों  को मुंबई के हाई प्रोफाइल निकाय चुनाव से पहले का वॉर्म अप माना जा रहा था. हर किसी की नजरें केवल ठाकरे बंधुओं पर थीं, लोग देखना चाहते के कि दोनों के मिलन का चुनावों पर क्या असर होता है लेकिन ठाकरे परिवार पहली ही बाधा पर लड़खड़ा गया.

उत्कर्ष पैनल की नाकामी

ठाकरे बंधुओं ने ‘उत्कर्ष पैनल’ बनाकर 21 सीटों पर उम्मीदवार उतारे- 18 शिवसेना (UBT) से, 2 एमएनएस से और 1 अनुसूचित जाति/जनजाति का लेकिन परिणाम निराशाजनक रहा. पैनल एक भी सीट नहीं जीत सका. शशांक राव के पैनल ने 14 सीटें हासिल कीं, जबकि सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन ने बाकी 7 सीटें जीतीं. शिवसेना का 9 साल पुराना सहकारी बोर्ड पर कब्जा टूट गया.

शशांक राव का उभार

शशांक राव, जो मई में बीजेपी में शामिल हुए, ने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़कर ठाकरे बंधुओं की कमजोरी उजागर की. उनके पिता शरद राव की तरह, शशांक BEST कर्मचारियों और ऑटो-रिक्शा यूनियनों की आवाज हैं. उनकी रणनीति ने वोटों को बांटा और ठाकरे बंधुओं के आधार की हकीकत सामने ला दी.

2006 में शिवसेना छोड़कर राज ठाकरे ने बनाई थी MNS

2006 में राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़कर एमएनएस बनाई थी, जिसने ठाकरे विरासत को सबसे बड़ा झटका दिया था. उद्धव ने शिवसेना और बाल ठाकरे की विरासत संभाली, जबकि राज मराठी गौरव के साथ विद्रोही तेवर लेकर निकले. दो दशकों तक यह विभाजन दोनों को भारी पड़ा. आज उद्धव की शिवसेना अपनी पुरानी ताकत खो चुकी है. एकनाथ शिंदे के विद्रोह और पार्टी चिन्ह छिनने के बाद उद्धव केवल अपने नाम पर निर्भर हैं. वहीं, राज की एमएनएस को कोई बड़ी जीत नहीं मिली और यह “मराठी गौरव” के नाम पर सड़क पर गुंडागर्दी के लिए चर्चा में रहती है.