'अनुकंपा पर नौकरी लेने के बाद फिर से...', सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिलने के बाद आश्रित ऊंचे पद की मांग नहीं कर सकता, क्योंकि यह व्यवस्था केवल तात्कालिक मानवीय राहत के लिए है, न कि करियर उन्नति के लिए
सरकारी सेवा से जुड़े अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और स्पष्ट दिशा तय की है. अदालत ने कहा है कि मृत कर्मचारी के आश्रित को एक बार अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिल जाने के बाद, वह उच्च पद पर नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता. यह फैसला उन मामलों में आया है, जहां अनुकंपा नियुक्ति को आगे बढ़ाकर पदोन्नति जैसा रूप देने की कोशिश की जा रही थी.
अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का मकसद केवल यह सुनिश्चित करना है कि कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसका परिवार तत्काल आर्थिक संकट से उबर सके. यह व्यवस्था स्थायी अधिकार या सेवा में आगे बढ़ने का साधन नहीं है, बल्कि विशुद्ध रूप से मानवीय आधार पर दी गई राहत है.
बार-बार अधिकार मांगने पर रोक
जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने टिप्पणी की कि एक बार किसी आश्रित को नौकरी देकर उसका अधिकार पूरा हो जाता है. इसके बाद उसी आधार पर दोबारा या ऊंची पोस्ट के लिए मांग करना स्वीकार्य नहीं है. अदालत ने इसे “कभी न खत्म होने वाली दया” की स्थिति बताया.
योग्यता के आधार पर दावा अस्वीकार्य
मामले की सुनवाई के दौरान यह तर्क दिया गया कि आश्रित व्यक्ति बाद में अपनी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर ऊंचे पद का हकदार हो सकता है. कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि योग्यता होने मात्र से अनुकंपा नियुक्ति को पदोन्नति का रास्ता नहीं बनाया जा सकता.
कानूनी सिद्धांत और समानता का सवाल
पीठ ने दोहराया कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 सभी नागरिकों को सरकारी नौकरी में समान अवसर का अधिकार देते हैं. यदि अनुकंपा नियुक्ति को विस्तार दिया गया, तो यह सामान्य भर्ती प्रक्रिया के साथ अन्याय होगा और कानून के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ जाएगा.
तमिलनाडु से जुड़ा मामला
यह फैसला तमिलनाडु सरकार की दो याचिकाओं पर आया, जिनमें मद्रास हाई कोर्ट के आदेशों को चुनौती दी गई थी. हाई कोर्ट ने पहले सफाईकर्मी के रूप में नियुक्त दो लोगों को जूनियर असिस्टेंट बनाने का निर्देश दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने असंगत मानते हुए रद्द कर दिया.