पुलिस की मीडिया ब्रीफिंग पर लगेगा नियमों का फ्रेम, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को दी 3 महीने की मोहलत

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को पुलिस-मीडिया ब्रीफिंग के लिए नीति बनाने का निर्देश दिया है. यह नीति वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन द्वारा तैयार मैनुअल पर आधारित होगी, जिससे जांच, अधिकार और पारदर्शिता का संतुलन बने.

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Kanhaiya Kumar Jha

नई दिल्ली: पुलिस और मीडिया के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान को लेकर लंबे समय से उठ रहे सवालों पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम कदम उठाया है. शीर्ष अदालत ने सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे पुलिस मीडिया ब्रीफिंग के लिए एक स्पष्ट और जिम्मेदार नीति बनाएं. यह नीति अदालत के अमीकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन द्वारा तैयार मैनुअल को आधार बनाकर बनाई जाएगी. इसका उद्देश्य अधिकारों की रक्षा और जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करना है.

न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्य सरकारों से कहा है कि वे पुलिस मीडिया ब्रीफिंग को लेकर एक सिद्धांत आधारित और अधिकारों के अनुकूल ढांचा तैयार करें. अदालत ने साफ किया कि यह नीति जांच की प्रक्रिया को सुरक्षित रखते हुए बनाई जानी चाहिए. राज्यों को इस आदेश की प्रति मिलने के तीन महीने के भीतर आवश्यक कदम उठाने को कहा गया है.

PUCL की याचिका से जुड़ा मामला

यह आदेश पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आया. इसी संगठन की याचिका पर 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस एनकाउंटर या संदिग्ध गैर-न्यायिक हत्याओं के बाद पालन की जाने वाली 16 अनिवार्य गाइडलाइंस तय की थीं. अदालत ने माना कि मीडिया ब्रीफिंग भी उसी श्रृंखला का अहम हिस्सा है.

अमीकस द्वारा तैयार मैनुअल

शुरुआत में गृह मंत्रालय को पुलिस मीडिया ब्रीफिंग के लिए सर्वोत्तम प्रक्रियाओं का मैनुअल तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी. बाद में यह काम अदालत के अमीकस क्यूरी गोपाल शंकरनारायणन को सौंपा गया. उन्होंने केंद्र सरकार की राय और अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं का अध्ययन कर ‘पुलिस मैनुअल फॉर मीडिया ब्रीफिंग’ तैयार किया.

राज्यों की उदासीनता पर टिप्पणी

अदालत ने अपने आदेश में यह भी दर्ज किया कि बार-बार समय देने के बावजूद अधिकांश राज्यों ने इस प्रक्रिया में पर्याप्त रुचि नहीं दिखाई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब मामलों को लंबित रखना उचित नहीं है. इसी वजह से राज्यों को सीधे निर्देश दिया गया है कि वे अमीकस द्वारा तैयार मैनुअल को ध्यान में रखते हुए अपनी नीति तय करें.

मैनुअल की मूल भावना

गोपाल शंकरनारायणन ने अपने मैनुअल में लिखा है कि जनता को समय पर और सही जानकारी देना जरूरी है. साथ ही पीड़ितों, गवाहों और आरोपियों की गरिमा, निजता और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही अहम है. मैनुअल में कहा गया है कि सोशल मीडिया के दौर में गलत सूचना कानून व्यवस्था बिगाड़ सकती है, इसलिए पुलिस केवल सत्यापित और आवश्यक जानकारी ही साझा करे.