आखिर क्या है 'रोमियो-जूलियट' कानून? जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिगों के प्यार के मामले में केन्द्र को दिए ये निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो कानून में रोमियो जूलियट क्लॉज जोड़ने की जरूरत बताई है. अदालत ने कहा कि सहमति से रिश्ते में रहने वाले नाबालिगों को अपराधी न बनाया जाए और कानून के दुरुपयोग पर रोक लगे.

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Km Jaya

नई दिल्ली: बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए पॉक्सो कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की है और इसमें रोमियो जूलियट क्लॉज का जिक्र किया है. अदालत ने माना कि कई मामलों में पॉक्सो कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है, जिससे सहमति से रिश्ते में रहने वाले किशोरों को अपराधी बना दिया जाता है. इसी को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि पॉक्सो कानून में रोमियो जूलियट जैसी धारा जोड़ी जाए.

यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक नाबालिग लड़की से जुड़े यौन उत्पीड़न मामले में आरोपी को जमानत दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान हाई कोर्ट के कुछ निर्देशों को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए रद्द कर दिया. कोर्ट ने साफ किया कि जमानत के स्तर पर पीड़ित की अनिवार्य मेडिकल उम्र जांच का आदेश देना सही नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो कानून का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से बचाना है, लेकिन इसे ऐसे मामलों में सख्ती से लागू करना गलत है, जहां दो किशोर उम्र में करीब हों और रिश्ता सहमति से हो. अदालत ने कहा कि रोमियो जूलियट क्लॉज का मकसद ऐसे वास्तविक किशोर संबंधों को कानूनी कठोरता से बचाना है.

क्या है रोमियो जूलियट कानून?

रोमियो जूलियट क्लॉज का मतलब यह है कि अगर दो किशोर सहमति से रिश्ते में हैं और उनकी उम्र में मामूली अंतर है, जैसे 17 साल की लड़की और 18 साल का लड़का, तो अदालतें अधिक संवेदनशील और उदार दृष्टिकोण अपना सकती हैं. हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर उम्र में बड़ा अंतर हो या जबरदस्ती का मामला हो, तो कानून पूरी सख्ती से लागू होगा.

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि पॉक्सो कानून के दुरुपयोग को लेकर बार बार न्यायिक संज्ञान लिया गया है. इसलिए इस फैसले की प्रति भारत सरकार के विधि सचिव को भेजी जाए. कोर्ट ने इसे आज के बच्चों और भविष्य के नेताओं की रक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बताया.

न्याय व्यवस्था पर जनता के भरोसे को लेकर क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पीड़ित की उम्र का निर्धारण मुकदमे का विषय है, न कि जमानत के चरण का. जमानत अदालत दस्तावेज देख सकती है, लेकिन उनकी सत्यता पर फैसला नहीं कर सकती. साथ ही अदालत ने वकीलों की नैतिक जिम्मेदारी पर जोर देते हुए कहा कि वे प्रतिशोधात्मक और तुच्छ मामलों के खिलाफ प्रहरी की भूमिका निभाएं, ताकि न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा बना रहे.