AI से लिखवाई गई याचिका देखकर भड़क गए CJI, सुप्रीम कोर्ट में वकील का झूठ इस तरह हुआ एक्सपोज
सुप्रीम कोर्ट में एक याचिकाकर्ता की भारी-भरकम अंग्रेजी ने उसे मुसीबत में डाल दिया. 12वीं पास छात्र ने एआई और कोर्ट के टाइपिस्ट की मदद से याचिका लिखी थी, जिसे चीफ जस्टिस ने चतुराई से पकड़ लिया.
नई दिल्ली: देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट अक्सर गंभीर कानूनी बहसों का गवाह बनती है. लेकिन हाल ही में चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच के सामने एक ऐसा मामला आया, जिसने सबको हंसने पर मजबूर कर दिया. एक जनहित याचिका में इस्तेमाल की गई जटिल अंग्रेजी देखकर सीजेआई को शक हुआ कि 12वीं पास याचिकाकर्ता ने इसे खुद नहीं लिखा है. इसके बाद कोर्ट रूम में जो हुआ वह किसी कॉमेडी फिल्म के स्क्रिप्ट जैसा था, जिसने तकनीक के दुरुपयोग को उजागर किया.
जब लुधियाना के सनातन धर्म स्कूल से पढ़े याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसने याचिका खुद तैयार की है, तो जस्टिस सूर्यकांत ने कोर्ट में ही उसका मौखिक टेस्ट लेने का फैसला किया. उन्होंने कहा कि यदि वह इसमें 30 नंबर भी ले आता है, तो वे मान लेंगे कि याचिका उसकी अपनी है. सीजेआई ने उससे 'fiduciary risk to corporate donors' जैसे शब्दों का अर्थ पूछा. याचिकाकर्ता चुप खड़ा रहा. यह स्थिति न्यायपालिका की सूक्ष्म निगरानी को दर्शाती है.
एआई और टाइपिस्ट का राज
कड़ाई से पूछताछ करने पर याचिकाकर्ता ने अंततः सच स्वीकार कर लिया. उसने माना कि कानूनी भाषा के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) टूल का उपयोग किया गया था. इसके अलावा उसने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के ही एक टाइपिस्ट 'दास सर' ने इसे टाइप करने में मदद की थी, जिसके बदले में उन्हें 1000 रुपये प्रति घंटा और तोहफे के रूप में चार जैकेट दी गई थीं. यह खुलासा होते ही पूरा कोर्ट रूम ठहाकों से गूंज उठा.
एआई के दुरुपयोग पर चिंता
सीजेआई सूर्यकांत पहले भी कानूनी प्रक्रियाओं में एआई के गलत इस्तेमाल पर अपनी कड़ी नाराजगी व्यक्त कर चुके हैं. उन्होंने वकीलों को चेतावनी दी है कि एआई से याचिकाएं बनवाने पर फर्जी केस लॉ का खतरा बढ़ जाता है. इस मामले में भी एआई का नाम आते ही कोर्ट का रुख काफी सख्त हो गया. यह घटना कानूनी क्षेत्र में नई तकनीक के गैर-जिम्मेदाराना उपयोग से जुड़ी चुनौतियों और नैतिक चिंताओं को प्रमुखता से सबके सामने रखती है.
याचिका खारिज और सख्त चेतावनी
कोर्ट ने इस जनहित याचिका को पूरी तरह से बनावटी और अस्पष्ट बताते हुए खारिज कर दिया. चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की कि एक छोटे व्यापारी के दिमाग से इतने जटिल संवैधानिक सवाल पैदा नहीं हो सकते. उन्होंने याचिकाकर्ता को भविष्य के लिए कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि वे दोबारा ऐसी बेतुकी याचिकाएं दायर न करें. कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि न्यायिक समय की बर्बादी और बनावटी आधारों पर तैयार की गई याचिकाओं को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
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