अंग्रेजों की जेल में बंद था ये क्रांतिकारी, बाहर निकला तो बदल गई पूरी जिंदगी; फिर बना महान योगी

श्री अरविंद अंग्रेजों के खिलाफ क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े थे और अलीपुर जेल में करीब एक साल रहे. जेल के आध्यात्मिक अनुभवों ने उनकी जिंदगी बदल दी और वे आगे चलकर योगी व आध्यात्मिक चिंतक बने.

AI Generated
Kanhaiya Kumar Jha

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास ऐसे मोड़ों से भरा है, जहां एक घटना ने किसी क्रांतिकारी की पूरी जिंदगी की दिशा बदल दी. श्री अरविंद यानी अरविंद घोष की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. एक समय वे ब्रिटिश शासन के खिलाफ उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल थे. गुप्त क्रांतिकारी गतिविधियों से लेकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ राजनीतिक लेखन तक, उनका जीवन संघर्ष से भरा था.

लेकिन 1908 में हुई गिरफ्तारी और उसके बाद अलीपुर जेल में बिताया गया करीब एक साल उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बन गया. जेल में उन्होंने गीता और उपनिषदों का अध्ययन किया, योग और ध्यान किया और आध्यात्मिक अनुभवों की ओर बढ़े. रिहाई के बाद उनका राजनीतिक जीवन कुछ समय तक जारी रहा, लेकिन 1910 में वे पांडिचेरी चले गए और आगे का जीवन योग, दर्शन और आध्यात्मिक साधना को समर्पित कर दिया.

अंग्रेजों के खिलाफ क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े थे अरविंद

श्री अरविंद का जन्म 15 अगस्त 1872 को कलकत्ता में हुआ था. सात वर्ष की उम्र में उन्हें शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया. उन्होंने सेंट पॉल्स स्कूल, लंदन और किंग्स कॉलेज, कैम्ब्रिज में शिक्षा प्राप्त की.


1893 में भारत लौटने के बाद उन्होंने बड़ौदा रियासत में काम किया और बाद में बड़ौदा कॉलेज में अध्यापन भी किया. इसी दौरान वे गुप्त क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े और ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह की तैयारियों में भूमिका निभाने लगे.

1905 में बंगाल विभाजन के बाद उनका राजनीतिक जीवन और ज्यादा सक्रिय हो गया. वे कलकत्ता पहुंचे और जल्द ही राष्ट्रवादी आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए.

उनका राजनीतिक विचार उस दौर के लिए बेहद मुखर था. वे भारत के लिए केवल सीमित राजनीतिक सुधार नहीं, बल्कि पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करने वाले शुरुआती नेताओं में थे. उनके लेखन ने युवाओं के बीच राष्ट्रवादी भावना को मजबूत किया.

sri aurobindo revolutionary Social Media

फिर आया अलीपुर बम कांड

1908 में मुजफ्फरपुर में ब्रिटिश मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड को निशाना बनाकर बम हमला किया गया. हमले में लक्ष्य बच गया, लेकिन दो यूरोपीय महिलाओं की मौत हो गई.

ब्रिटिश पुलिस ने इस घटना की जांच तेज कर दी और क्रांतिकारी नेटवर्क से जुड़े कई लोगों को गिरफ्तार किया. 2 मई 1908 को श्री अरविंद को भी गिरफ्तार कर लिया गया. उन पर षड्यंत्र और क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े गंभीर आरोप लगाए गए. इसके बाद उन्हें अलीपुर जेल भेज दिया गया. यहीं से उनकी जिंदगी का वह अध्याय शुरू हुआ, जिसने आगे चलकर उन्हें क्रांतिकारी से आध्यात्मिक साधक बना दिया.

अलीपुर जेल बनी उनका सबसे बड़ा आध्यात्मिक मोड़

अलीपुर जेल में अरविंद ने करीब एक साल बिताया. मुकदमा लंबा चला और उन्हें कुछ समय एकांत कारावास में भी रखा गया. जेल की परिस्थितियां कठिन थीं, लेकिन इसी दौरान उनका ध्यान लगातार आध्यात्मिक साधना की ओर बढ़ता गया. उन्होंने भगवद्गीता और उपनिषदों का अध्ययन किया तथा ध्यान और योग का अभ्यास किया.

श्री अरविंद के अपने लेखन के अनुसार, जेल में उनके आध्यात्मिक अनुभवों ने उनके जीवन और कार्य को देखने का नजरिया बदल दिया. बाद में उन्होंने जेल के उस समय को साधना के एक निर्णायक चरण के रूप में याद किया. यही वह बिंदु था जहां उनका जीवन केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की लड़ाई तक सीमित नहीं रहा.

अदालत में चला मुकदमा, बाहर बदल रहा था अरविंद का जीवन

अलीपुर बम केस की सुनवाई लगभग एक वर्ष चली. श्री अरविंद की पैरवी प्रसिद्ध वकील चित्तरंजन दास ने की. 6 मई 1909 को अदालत ने उन्हें बरी कर दिया और वे जेल से बाहर आए.

लेकिन जेल से बाहर निकलने के बाद वे तुरंत राजनीति से अलग नहीं हुए. उन्होंने राजनीतिक लेखन जारी रखा और 'कर्मयोगिन' नाम से साप्ताहिक पत्रिका भी शुरू की. 1909 से 1910 के बीच उनके लेखों में राष्ट्रवाद, राजनीति, आध्यात्मिकता और भारत के भविष्य पर विचार दिखाई देते हैं.

इसलिए यह कहना अधिक सही है कि जेल से निकलने के बाद वे सीधे साधु नहीं बने. बल्कि जेल में शुरू हुआ आध्यात्मिक परिवर्तन अगले कुछ वर्षों में धीरे-धीरे उनकी पूरी जीवन दिशा बदलने लगा.

ब्रिटिश गिरफ्तारी का डर और चंद्रनगर की ओर प्रस्थान

1910 की शुरुआत में ब्रिटिश सरकार की नजर फिर उन पर थी. गिरफ्तारी की आशंका बढ़ने के बीच उन्होंने कलकत्ता छोड़कर चंद्रनगर का रुख किया. अपने संस्मरणों में श्री अरविंद ने लिखा कि उन्हें भीतर से चंद्रनगर जाने का निर्देश जैसा अनुभव हुआ. वहां वे राजनीतिक गतिविधियों से अलग होकर साधना में अधिक डूब गए. इसके बाद उन्होंने ब्रिटिश भारत छोड़कर फ्रांसीसी नियंत्रण वाले पांडिचेरी जाने का फैसला किया. 4 अप्रैल 1910 को वे पांडिचेरी पहुंचे. यह उनके जीवन का दूसरा बड़ा मोड़ था.

पांडिचेरी में शुरू हुआ योगी का नया जीवन

पांडिचेरी पहुंचने के बाद श्री अरविंद ने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली और अपना जीवन आध्यात्मिक साधना के लिए समर्पित कर दिया. उन्होंने आगे चलकर इंटीग्रल योग यानी पूर्ण योग की अवधारणा विकसित की. उनका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत मुक्ति नहीं था, बल्कि मानव चेतना और जीवन के व्यापक परिवर्तन की कल्पना करना था.

1926 में उनके आध्यात्मिक सहयोगी 'द मदर' के साथ मिलकर श्री अरविंद आश्रम की स्थापना हुई. बाद में उनकी प्रमुख कृतियों में 'द लाइफ डिवाइन', 'द सिंथेसिस ऑफ योगा' और 'सावित्री' जैसी रचनाएं शामिल हुईं.

क्रांतिकारी से आध्यात्मिक चिंतक बनने की कहानी

श्री अरविंद की कहानी को सिर्फ यह कहकर समझना आसान नहीं है कि एक क्रांतिकारी जेल गया और फिर साधु बन गया. असल कहानी इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प है.

एक तरफ वे ब्रिटिश शासन के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष में सक्रिय थे. दूसरी तरफ 1905 से ही वे योग का अभ्यास कर रहे थे. अलीपुर जेल ने उनके भीतर चल रही इस आध्यात्मिक यात्रा को बेहद गहरा कर दिया. जेल से निकलने के बाद उन्होंने कुछ समय तक राष्ट्रवादी राजनीति और पत्रकारिता जारी रखी, लेकिन अंततः उनका रास्ता पांडिचेरी की ओर मुड़ गया.

यानी अलीपुर जेल उनके जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नए जीवन की शुरुआत थी.

इतिहास में क्यों खास है यह कहानी?

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में श्री अरविंद का स्थान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके जीवन में राजनीतिक क्रांति और आध्यात्मिक परिवर्तन दोनों एक साथ दिखाई देते हैं.

उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ पूर्ण स्वतंत्रता की बात उस समय उठाई जब यह विचार अभी मुख्यधारा की राजनीति में पूरी तरह स्थापित नहीं हुआ था. बाद में उन्होंने सक्रिय राजनीति छोड़कर आध्यात्मिक साधना का रास्ता चुना, लेकिन भारत और मानव सभ्यता को लेकर उनके विचार उनके लेखन के माध्यम से लंबे समय तक प्रभाव डालते रहे.

अलीपुर जेल में बंद वह क्रांतिकारी आखिरकार ऐसा आध्यात्मिक चिंतक बना, जिसने स्वतंत्रता को केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन के रूप में नहीं देखा.

यही श्री अरविंद की कहानी को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे असाधारण कहानियों में शामिल करती है.