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महिला आरक्षण बिल के लिए विपक्ष की जरूरत, लोकसभा में 67 तो राज्यसभा में 21 वोट कम; यहां समझें नंबर गेम

संसद में आज यानी गुरुवार को तीन विधेयक पेश किया जा रहा है. जिसका उद्देश्य महिलाओं को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण उपलब्ध कराना है.

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Edited By: Shanu Sharma
महिला आरक्षण बिल के लिए विपक्ष की जरूरत, लोकसभा में 67 तो राज्यसभा में 21 वोट कम; यहां समझें नंबर गेम
Courtesy: ANI

संसद के विशेष सत्र के पहले दिन आज सरकार तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश करने जा रही है. इन विधेयकों का मुख्य उद्देश्य 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले महिलाओं को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण उपलब्ध कराना है.

संसद का यह विशेष सत्र 16 से 18 अप्रैल तक चलने वाला है. इसमें लोकसभा की सदस्य संख्या को वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 करने संबंधी संविधान संशोधन विधेयक पेश किया जाएगा. साथ ही, परिसीमन आयोग के गठन के लिए अलग से एक विधेयक और केंद्र शासित प्रदेशों से संबंधित कानून संशोधन विधेयक, 2026 भी लाया जाएगा. 

बदलाव के लिए विपक्ष की जरूरत 

आरक्षण का कोटा परिसीमन और जनगणना की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है. केंद्र सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन कर आरक्षण लागू करने की योजना बना रही है. परिसीमन के बाद लोकसभा में कुल सीटें 815 तक पहुंच सकती हैं, जबकि केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें प्रस्तावित हैं. वर्तमान में राज्यों से 530 और केंद्र शासित प्रदेशों से 13 सदस्य लोकसभा में चुनकर आते हैं. दो विधेयक संविधान संशोधन वाले हैं, जिन्हें पारित करने के लिए संसद में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की जरूरत पड़ेगी. लोकसभा में यह आंकड़ा करीब 360 है. सत्ताधारी एनडीए के पास वर्तमान में 293 सदस्य हैं, ऐसे में उसे अतिरिक्त वोटों की आवश्यकता होगी.

क्या है विपक्ष का रुख?

राज्यसभा में जादुई आंकड़ा 163 है, जहां एनडीए की ताकत 142 के आसपास बताई जा रही है. विपक्ष के वॉकआउट से बहुमत का आंकड़ा प्रभावित हो सकता है. सरकार को उम्मीद है कि व्यापक सहमति बनाकर विधेयक पारित हो जाएंगे. केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा है कि कोई भी दल सिद्धांत रूप से महिला आरक्षण का विरोध नहीं कर रहा. उन्होंने जोर देकर कहा कि यह बिल किसी एक दल का नहीं, बल्कि पूरे देश और सभी दलों का है.

विपक्षी दलों का कहना है कि वे महिला आरक्षण के पूर्ण समर्थक हैं, लेकिन सरकार द्वारा इसे परिसीमन और 2029 के चुनावों से जोड़ने पर वे विरोध कर रहे हैं. उनका तर्क है कि 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण दक्षिण भारतीय राज्यों की संसदीय शक्ति को कमजोर कर सकता है.