नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को डिजिटल अरेस्ट और साइबर फ्रॉड के मामलों पर सुनवाई के दौरान बैंकों की कार्यशैली पर तीखी टिप्पणी की. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि 54 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि ठगी का शिकार हुई है, जो कई छोटे राज्यों के सालाना बजट से भी बड़ी है.
पीठ ने इसे खुली लूट और डकैती बताया. अदालत ने बैंकों की लापरवाही या मिलीभगत को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि वे लाभ कमाने की होड़ में जनता के भरोसे को तोड़ रहे हैं. न्यायालय ने केंद्र सरकार को आरबीआई, बैंकों और दूरसंचार विभाग से चर्चा कर साइबर अपराध रोकने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करने का आदेश दिया.
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि बैंक अब बोझ बनते जा रहे हैं. वे धन के संरक्षक हैं, लेकिन लाभ के लालच में धोखेबाजों को सहारा दे रहे हैं. पेंशनभोगी जो सामान्यतः 10-20 हजार रुपये निकालते हैं, अचानक बड़ी रकम ट्रांसफर करने पर बैंक को तुरंत अलर्ट जारी करना चाहिए. पीठ ने पूछा कि एआई टूल्स का इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहा है. न्यायमूर्ति बागची ने गृह मंत्रालय की रिपोर्ट का हवाला देते हुए अप्रैल 2021 से नवंबर 2025 तक 52 हजार करोड़ से ज्यादा की हेराफेरी बताई.
अटॉर्नी जनरल ने बताया कि आरबीआई ने साइबर फ्रॉड रोकने के लिए एसओपी का मसौदा तैयार किया है, जिसमें संदिग्ध खातों पर अस्थायी रोक लगाने जैसे कदम शामिल हैं. अदालत ने गृह मंत्रालय को इसे देशव्यापी लागू करने का निर्देश दिया. वरिष्ठ अधिवक्ता एनएस नप्पिनई ने एआई से संदिग्ध लेनदेन पर ग्राहकों को अलर्ट भेजने का सुझाव दिया, जिस पर पीठ ने सहमति जताई.
पीठ ने सीबीआई को डिजिटल अरेस्ट मामलों की जांच सौंपते हुए गुजरात और दिल्ली सरकारों से स्वीकृति देने को कहा. अदालत ने पीड़ितों को मुआवजा देने में उदार रुख अपनाने पर बल दिया. याचिका की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी. न्यायालय ने बैंकों से सक्रिय भूमिका निभाने और 'म्यूल' खातों पर नजर रखने को कहा.
डिजिटल अरेस्ट में ठग खुद को पुलिस या सरकारी अधिकारी बताकर वीडियो कॉल पर डराते हैं और पैसे ऐंठते हैं. अदालत ने पहले भी इस पर चिंता जताई थी और विदेश भेजी जा रही राशि रोकने पर जोर दिया था.