भारत में आरक्षण को लेकर बहस नई नहीं है. लेकिन हाल के दिनों में यह मुद्दा एक बार फिर सड़कों से लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों तक तेज हो गया है. दिल्ली के जंतर-मंतर पर अगस्त 2026 में हुए Reservation Reform Andolan' के बाद आरक्षण व्यवस्था को लेकर नई चर्चा शुरू हुई. आंदोलन से जुड़े लोगों ने जाति के बजाय आर्थिक आधार को प्राथमिकता देने और मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा की मांग उठाई. इसके बाद केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने आंदोलन के प्रतिनिधियों से मुलाकात भी की.
लेकिन इस बहस के बीच एक सवाल बार-बार पूछा जाता है कि आखिर संविधान में आरक्षण की व्यवस्था क्यों की गई थी? क्या इसे सिर्फ 10 साल के लिए बनाया गया था? और अगर परिस्थितियां बदलती हैं तो क्या संविधान में इसके प्रावधानों को बदला जा सकता है?
इन सवालों का जवाब समझने के लिए आरक्षण को एक ही व्यवस्था मानने के बजाय उसके अलग-अलग रूपों को समझना जरूरी है.
भारत का संविधान ऐसे समाज में बनाया गया था, जहां सदियों से जाति के आधार पर सामाजिक भेदभाव और असमानता मौजूद थी. समाज के कुछ वर्गों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों, को शिक्षा, सार्वजनिक जीवन, सरकारी संस्थाओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के समान अवसर लंबे समय तक नहीं मिले थे.
संविधान निर्माताओं के सामने सवाल सिर्फ इतना नहीं था कि सभी नागरिकों को कानून की नजर में बराबर घोषित कर दिया जाए. असली चुनौती यह थी कि जिन लोगों की शुरुआती स्थिति ही बराबर नहीं थी, उन्हें बराबरी के स्तर तक कैसे पहुंचाया जाए.
यहीं से आरक्षण और विशेष प्रावधानों की संवैधानिक सोच सामने आई.
संविधान का उद्देश्य केवल औपचारिक समानता देना नहीं था, बल्कि उन वर्गों को आगे बढ़ने का अवसर देना भी था जो ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से पीछे रह गए थे.
इसी सोच का एक महत्वपूर्ण आधार अनुच्छेद 46 है, जिसमें राज्य को समाज के कमजोर वर्गों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों, के शैक्षिक और आर्थिक हितों को विशेष रूप से बढ़ावा देने की दिशा में काम करने को कहा गया है.
इस सवाल का जवाब थोड़ा विस्तार से समझना होगा.
संविधान में समानता का मूल सिद्धांत अनुच्छेद 14 में है. लेकिन समानता का अर्थ हर परिस्थिति में हर व्यक्ति के साथ बिल्कुल एक जैसा व्यवहार करना नहीं माना गया.
समय के साथ संविधान और कानूनों के माध्यम से ऐसे प्रावधान विकसित हुए जिनके तहत सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा SC-ST समुदायों के लिए विशेष व्यवस्थाएं की जा सकीं.
अनुच्छेद 15 भेदभाव के खिलाफ समानता का सिद्धांत देता है. इसके बाद संवैधानिक संशोधनों के जरिए राज्य को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा SC-ST के लिए विशेष प्रावधान करने की स्पष्ट शक्ति दी गई.
आज अनुच्छेद 15 के विभिन्न प्रावधानों के तहत शिक्षा से जुड़े विशेष प्रावधान और आरक्षण की व्यवस्था का संवैधानिक आधार मौजूद है.
सरकारी सेवाओं में अवसर की समानता का सिद्धांत अनुच्छेद 16 में दिया गया है.
इसी अनुच्छेद में राज्य को उन पिछड़े वर्गों के लिए नियुक्तियों में आरक्षण देने की शक्ति दी गई है, जिनका सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है.
यानी आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था का उद्देश्य केवल गरीबी दूर करना नहीं था. इसका एक बड़ा आधार सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन तथा संस्थाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व का सवाल भी रहा है.
यहीं सबसे ज्यादा भ्रम पैदा होता है.
संविधान लागू होने के समय अनुच्छेद 334 के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण को मूल रूप से 10 साल के लिए रखा गया था.
यह अवधि 26 जनवरी 1950 से शुरू हुई थी.
ध्यान देने वाली बात यह है कि यह 10 साल की सीमा संसद और विधानसभाओं में राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए सीटों के आरक्षण से संबंधित थी.
इसे शिक्षा और सरकारी नौकरियों में सभी प्रकार के आरक्षण की 10 साल की समाप्ति-सीमा मान लेना सही नहीं है. संविधान के अलग-अलग प्रावधानों का उद्देश्य और कानूनी ढांचा अलग है. संविधान के मूल अनुच्छेद 334 में यही 10 साल की व्यवस्था थी.
मूल व्यवस्था के अनुसार राजनीतिक सीटों का आरक्षण 10 साल बाद समाप्त होना था. लेकिन संसद ने समय-समय पर संविधान संशोधन करके इसकी अवधि बढ़ाई.
यहां एक अहम बात समझनी चाहिए कि संविधान निर्माताओं ने भी यह व्यवस्था ऐसी नहीं बनाई थी जिसे भविष्य में बदला ही न जा सके.
बाद में संसद ने संवैधानिक संशोधनों के जरिए SC-ST के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी अवधि को आगे बढ़ाया. उदाहरण के लिए 1969 के 23वें संविधान संशोधन के पीछे दिए गए कारणों में कहा गया था कि प्रगति के बावजूद वे परिस्थितियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थीं जिनके कारण यह विशेष व्यवस्था की गई थी.
1980 के 45वें संविधान संशोधन में भी इसी आधार पर अवधि को आगे बढ़ाया गया.
वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SC-ST के लिए सीटों का आरक्षण संविधान लागू होने से 80 वर्ष तक जारी रखने का प्रावधान है. 104वें संविधान संशोधन के बाद अनुच्छेद 334 में यह व्यवस्था लागू है.
यह कहना गलत होगा कि संविधान में आरक्षण से जुड़े प्रावधानों में कभी संशोधन नहीं हो सकता.
भारत का संविधान संशोधन की व्यवस्था देता है. संसद ने आरक्षण से जुड़े कई संवैधानिक प्रावधानों में समय-समय पर बदलाव किए हैं.
इसका सबसे बड़ा उदाहरण हाल के वर्षों में EWS यानी Economically Weaker Sections के लिए दिया गया 10 प्रतिशत आरक्षण है.
2019 में 103वें संविधान संशोधन के जरिए संविधान में अनुच्छेद 15(6) और 16(6) जोड़े गए. इन प्रावधानों ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत तक आरक्षण का संवैधानिक आधार बनाया. केंद्र सरकार ने अगस्त 2026 में भी संसद को बताया कि मौजूदा EWS व्यवस्था 103वें संविधान संशोधन के तहत लागू है और इसे बदलने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है.
यानी भारतीय संविधान में आरक्षण से जुड़े प्रावधानों में बदलाव पहले भी हुए हैं और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत भविष्य में भी संशोधन संभव है.
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि संसद संविधान के किसी भी हिस्से को बिना किसी सीमा के बदल सकती है.
संसद की संशोधन शक्ति की भी एक सीमा है
संविधान संशोधन के मामले में भारत की न्यायपालिका ने Basic Structure यानी मूल संरचना के सिद्धांत को महत्वपूर्ण माना है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती.
आरक्षण से जुड़े संवैधानिक संशोधन भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकते हैं.
EWS आरक्षण से जुड़े 103वें संविधान संशोधन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. नवंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत के फैसले से इस संशोधन को बरकरार रखा. फैसले में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए विशेष प्रावधान और 10 प्रतिशत तक आरक्षण की संवैधानिक वैधता पर विचार किया गया था.
यह भी बहस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.
1992 के इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सामान्य सिद्धांत के रूप में कहा था कि अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत आरक्षण सामान्यतः 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए.
केंद्र सरकार ने संसद में दिए जवाबों में भी इस फैसले का उल्लेख किया है. सरकार के अनुसार SC, ST और OBC से संबंधित आरक्षण के संदर्भ में 50 प्रतिशत की सीमा का सिद्धांत लागू माना गया, जबकि EWS का 10 प्रतिशत आरक्षण संविधान के अनुच्छेद 15(6) और 16(6) के तहत अलग संवैधानिक आधार पर दिया गया.
इसी कारण भारत में आरक्षण पर चर्चा केवल “आरक्षण है या नहीं है” तक सीमित नहीं है. इसके भीतर कई अलग कानूनी और संवैधानिक प्रश्न शामिल हैं.
अगस्त 2026 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर Reservation Reform Andolan के बैनर तले विरोध प्रदर्शन हुआ.
आंदोलन से जुड़े लोगों ने मौजूदा जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था में बदलाव और आर्थिक आधार को अधिक महत्व देने की मांग उठाई. प्रदर्शन के बाद आंदोलन के प्रतिनिधियों और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा के बीच बातचीत भी हुई.
27 अगस्त को हुई बैठक के बाद नड्डा ने कहा कि आंदोलन से जुड़े प्रतिनिधियों के साथ चर्चा हुई और आगे फिर बैठक होगी. रिपोर्टों के अनुसार आंदोलनकारी आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा और जाति के बजाय आर्थिक आधार को प्राथमिकता देने की मांग कर रहे हैं.
हालांकि इस आंदोलन की मांग और सरकार की संवैधानिक नीति को एक ही चीज मान लेना सही नहीं होगा.
विरोध प्रदर्शन या किसी राजनीतिक समूह की मांग का अर्थ यह नहीं है कि सरकार ने आरक्षण खत्म करने या संविधान बदलने का फैसला कर लिया है.
अब तक उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के अनुसार, आंदोलन के प्रतिनिधियों से बातचीत हुई है, लेकिन इससे मौजूदा आरक्षण नीति में किसी तत्काल बदलाव की घोषणा नहीं होती.
कुछ लोग इसे सामाजिक प्रतिनिधित्व और बराबरी के लिए जरूरी मानते हैं. वहीं कुछ लोग चाहते हैं कि व्यवस्था की समीक्षा हो और आर्थिक स्थिति को अधिक महत्व दिया जाए.
लेकिन संवैधानिक दृष्टि से यह समझना जरूरी है कि आरक्षण की सभी श्रेणियां एक जैसी नहीं हैं और उनका कानूनी आधार भी एक जैसा नहीं है.
भारत में आरक्षण की व्यवस्था अचानक नहीं बनी थी. इसके पीछे सदियों की सामाजिक असमानता, प्रतिनिधित्व की कमी और समान अवसर देने की संवैधानिक सोच थी.
हां, संविधान निर्माताओं ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण को मूल रूप से 10 साल की अवधि के साथ रखा था. लेकिन संसद ने बाद में संविधान संशोधनों के जरिए इस अवधि को कई बार बढ़ाया.
दूसरी ओर शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण का संवैधानिक ढांचा अलग-अलग अनुच्छेदों और समय-समय पर हुए संशोधनों पर आधारित है.