'खुद का मुल्क तो संभल नहीं रहा', सीएम उमर अब्दुल्ला ने पाकिस्तानी पीएम के 'हसीन सपनों' पर कसा तंज

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ के कश्मीर वाले बयान पर करारा तंज कसा है. उन्होंने कहा कि जो देश अपना मौजूदा हिस्सा नहीं संभाल पा रहा, वह हमें क्या संभालेगा और कैसे संभालेगा.

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Kanhaiya Kumar Jha

नई दिल्ली: श्रीनगर में पत्रकारों से बात करते हुए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने पाकिस्तान की मंशा पर पानी फेर दिया. शहबाज शरीफ ने हाल ही में कश्मीर को पाकिस्तान की 'गर्दन की नस' बताते हुए भविष्य में उसे अपने देश का हिस्सा बनाने का दावा किया था. अब्दुल्ला ने शुक्रवार को इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता की ओर इशारा किया. इसके साथ ही उन्होंने सिंधु जल समझौते के निलंबन और राज्य की बिजली परियोजनाओं पर पड़ने वाले इसके संभावित असर पर भी विस्तार से अपनी बात रखी.

शहबाज शरीफ ने 'कश्मीर एकजुटता दिवस' के अवसर पर मुजफ्फराबाद की विधानसभा में जो भाषण दिया, वह पूरी तरह से सच्चाई से परे था. उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना के पुराने शब्दों का सहारा लेते हुए कश्मीर को पाकिस्तान की 'गर्दन की नस' बताया. शरीफ का यह कहना कि कश्मीर एक दिन पाकिस्तान का हिस्सा बन जाएगा, उनकी हताशा को दर्शाता है. भारत ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि ऐसी बयानबाजी से जमीनी हकीकत नहीं बदलेगी और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग ही रहेगा.

उमर अब्दुल्ला का करारा पलटवार 

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने शुक्रवार को इस दावे पर जो प्रहार किया, वह पाकिस्तान की प्रशासनिक पोल खोलने वाला था. उन्होंने हंसते हुए पूछा कि क्या पाकिस्तान वाकई हमें अपने साथ मिलाना चाहता है? अब्दुल्ला ने तीखा कटाक्ष करते हुए कहा कि जो मुल्क अपने नियंत्रण वाले इलाकों का प्रबंधन करने में ही विफल है, वह हमें क्या संभालेगा? उनके इस बयान ने यह संदेश दिया कि पाकिस्तान को दूसरे के घरों में झांकने से पहले अपनी गिरती आर्थिक और राजनीतिक हालत सुधारनी चाहिए.

भारत की अखंडता और स्पष्ट संकल्प 

कश्मीर पर भारत का आधिकारिक रुख हमेशा से अडिग रहा है. गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में स्पष्ट कहा था कि जम्मू-कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है और पीओके को वापस लाना हमारा लक्ष्य है. भारत की विदेश नीति भी इसी दिशा में काम करती है. उमर अब्दुल्ला का ताजा बयान राष्ट्रीय मुख्यधारा के इसी विचार को मजबूती देता है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी धीरे-धीरे यह समझ रहा है कि पाकिस्तान द्वारा उठाया गया कश्मीर का मुद्दा अब पुराना और पूरी तरह अर्थहीन हो चुका है.

सिंधु जल संधि पर अब्दुल्ला का स्पष्टीकरण 

कश्मीर मुद्दे से इतर, मुख्यमंत्री ने सिंधु जल संधि (IWT) के निलंबन से होने वाले लाभों पर भी अपनी बेबाक राय रखी. उन्होंने कहा कि यद्यपि यह संधि वर्तमान में अधर में लटकी है, परंतु अब तक इसका कोई विशेष फायदा जम्मू-कश्मीर को नहीं मिला है. रातले और पक्कल दुल जैसी निर्माणाधीन परियोजनाओं के मूल ढांचे या पानी स्टोर करने की क्षमता में कोई बदलाव नहीं हुआ है. इसलिए बिजली उत्पादन के मामले में फिलहाल राज्य को कोई बड़ी राहत मिलती नहीं दिख रही है.

हालांकि, उमर अब्दुल्ला ने भविष्य की ऊर्जा परियोजनाओं के लिए कुछ सकारात्मक संभावनाएं जरूर देखी हैं. उन्होंने सोपोर के पास तुलबुल नेविगेशन बैराज का जिक्र किया, जिससे झेलम नदी और वुलर झील के जल प्रबंधन में सुधार हो सकता है. इससे उरी-1 और उरी-2 जैसी बड़ी पनबिजली परियोजनाओं की कार्यक्षमता बढ़ सकती है. मुख्यमंत्री ने निष्कर्ष निकाला कि यदि भविष्य में जल प्रबंधन को लेकर अधिक स्वायत्तता और लचीलापन मिलता है, तो निश्चित रूप से राज्य को इसका बहुत बड़ा दीर्घकालिक लाभ प्राप्त होगा.