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अविश्वास प्रस्ताव के बीच ओम बिरला ने छोड़ी कुर्सी! जानें लोकसभा में कार्यवाही को लेकर क्या लिया फैसला?

विपक्ष द्वारा पद से हटाने का नोटिस दिए जाने के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अस्थायी रूप से सदन की अध्यक्षता से दूरी बना ली है. आगामी 9 मार्च को इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर चर्चा होने की संभावना है.

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Kanhaiya Kumar Jha

नई दिल्ली: संसद के वर्तमान बजट सत्र के दौरान एक अत्यंत नाटकीय और अभूतपूर्व घटनाक्रम में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन की अध्यक्षता से अस्थायी रूप से हटने का निर्णय लिया है. विपक्षी दलों द्वारा उन्हें पद से हटाने के लिए दिए गए औपचारिक नोटिस के बाद उन्होंने यह नैतिक कदम उठाया. कांग्रेस सांसद के. सुरेश ने कई प्रमुख विपक्षी दलों की ओर से यह संकल्प नोटिस लोकसभा सचिवालय को सौंपा है. बिरला ने महासचिव को नियमों के तहत इस पर उचित कार्यवाही करने का निर्देश दिया है.

कांग्रेस सांसद के. सुरेश द्वारा पेश किए गए इस प्रस्ताव ने सदन के भीतर राजनीतिक सरगर्मी को काफी बढ़ा दिया है. सूत्रों के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस ने शुरुआत में इस प्रस्ताव पर आगे बढ़ने से पहले अध्यक्ष को उनके द्वारा उठाए गए सरोकारों पर विचार करने के लिए सात दिनों का समय देने का सुझाव दिया था. हालांकि, बाद में विपक्षी गुट ने प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया. अध्यक्ष ओम बिरला ने इसे एक 'नैतिक कदम' बताते हुए कहा कि वह इस प्रस्ताव पर सदन के अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा करेंगे.

संवैधानिक प्रावधान और उसकी जटिलता 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94(सी) के तहत लोकसभा अध्यक्ष को सदन के तत्कालीन सदस्यों के बहुमत द्वारा पारित संकल्प के जरिए उनके पद से हटाया जा सकता है. हालांकि, भारतीय संसदीय इतिहास में ऐसे मौके बहुत ही कम आए हैं जब किसी आसीन अध्यक्ष के खिलाफ इस तरह का प्रस्ताव लाया गया हो. इसे एक असाधारण संसदीय उपाय माना जाता है. विपक्षी दल इस संवैधानिक अधिकार का उपयोग करके अध्यक्ष की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं, जिससे सत्ता पक्ष और विपक्ष के मध्य काफी तनाव बढ़ गया है.

विपक्ष द्वारा लगाए गए गंभीर आरोप 

कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने सोशल मीडिया के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि विपक्ष ने यह कदम 'असाधारण परिस्थितियों' के कारण ही उठाया है. उनका मुख्य आरोप है कि विपक्षी सांसदों को सदन में जनहित के महत्वपूर्ण मुद्दे उठाने के पर्याप्त अवसर नहीं दिए जा रहे थे. टैगोर ने जोर देकर कहा कि यह कोई व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है, बल्कि यह कदम पूरी तरह से संवैधानिक मर्यादा और संसदीय परंपराओं की रक्षा के लिए उठाया गया है. विपक्ष का मानना है कि सदन में उनकी आवाज को दबाया जा रहा था.