मिडिल ईस्ट की जंग का 'थाली कनेक्शन'; फल-सब्जियों से लेकर दाल और तेल तक, जानें आपकी जेब पर कितनी पड़ेगी मार?
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने भारतीय व्यापार की कमर तोड़ दी है. बंदरगाहों पर अटके कंटेनर और लंबे समुद्री रास्तों ने लागत बढ़ा दी है. जिससे खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ने और महंगाई का खतरा बढ़ गया है.
नई दिल्ली: मध्य पूर्व में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच गहराता युद्ध अब भारतीय रसोई और बाजारों तक पहुंचने लगा है. हालांकि यह संघर्ष भौगोलिक रूप से दूर है, लेकिन इसकी तपिश भारतीय बंदरगाहों पर साफ महसूस की जा रही है. समुद्री व्यापार मार्ग बाधित होने से आयात और निर्यात का संतुलन बिगड़ गया है. जहाजों को अब लंबे रास्तों का सहारा लेना पड़ रहा है, जिससे न केवल समय बल्कि माल ढुलाई की लागत भी कई गुना बढ़ गई है.
मुंबई के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट और मुंद्रा पोर्ट पर इस समय अफरा-तफरी का माहौल है. यहां एक हजार से ज्यादा कंटेनर फंसे हुए हैं, जिनमें नासिक के ताजे प्याज, अंगूर, केले और पपीते भरे हैं. ये उत्पाद दुबई और अन्य खाड़ी देशों के लिए रवाना होने थे, लेकिन युद्ध की स्थिति ने वहां के बाजारों को ठंडा कर दिया है. निर्यातकों को डर है कि अगर जल्द समाधान नहीं निकला, तो करोड़ों का माल खराब हो सकता है.
शिपिंग का लंबा और महंगा रास्ता
सुरक्षा चिंताओं के कारण व्यापारिक जहाज अब होर्मुज जलडमरूमध्य के बजाय अफ्रीका के 'केप ऑफ गुड होप' का लंबा रास्ता अपना रहे हैं. इस बदलाव से यात्रा का समय 20 से 25 दिन बढ़ गया है. यात्रा लंबी होने से ईंधन का खर्च बढ़ा है और समुद्री बीमा की लागत में भी भारी उछाल आया है. कुल मिलाकर, शिपिंग का पूरा गणित अब निर्यातकों और उपभोक्ताओं के लिए महंगा साबित हो रहा है.
त्योहारी सीजन में व्यापार पर संकट
खाड़ी देशों में रमजान का पवित्र महीना चल रहा है और ईद की तैयारियां जोर-शोर पर हैं. ऐसे में भारत से बासमती चावल, चीनी और ताजी सब्जियों का बड़ा निर्यात संकट में है. यूएई हर महीने भारत से अरबों डॉलर का सामान खरीदता है. युद्ध लंबा खिंचने पर 300 से अधिक कंटेनरों का माल बर्बाद होने की कगार पर है. निर्यातकों को हर कंटेनर पर रोजाना 8,000 रुपये का अतिरिक्त जुर्माना भरना पड़ रहा है.
महंगाई की नई लहर का डर
व्यापार में इस रुकावट का सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा. ऑस्ट्रेलिया से आने वाली दालें महंगी हो सकती हैं, जबकि ईरान से आने वाले सूखे मेवे जैसे खजूर, पिस्ता और सेब के दाम बढ़ने की आशंका है. घरेलू बाजार में भी सामान की अधिकता से प्याज जैसी फसलों के दाम गिरने का डर है, जिससे किसानों को नुकसान होगा. कपड़ा और जूता उद्योग के विदेशी ऑर्डर भी अधर में लटके हुए हैं.
सरकार की राहत की योजना
इस आर्थिक चुनौती से निपटने के लिए वाणिज्य मंत्रालय ने पांच सूत्री आपातकालीन रोडमैप तैयार किया है. सरकार का ध्यान निर्यात मंजूरी को आसान बनाने और खराब होने वाले माल के लिए 'फास्ट ट्रैक क्लीयरेंस' देने पर है. मंत्रालयों के बीच रियल टाइम डेटा साझा करने और छोटे उद्योगों को वित्तीय सुरक्षा देने की कोशिशें शुरू कर दी गई हैं. प्राथमिकता यह है कि घरेलू जरूरतों के लिए आयात प्रभावित न हो और महंगाई काबू में रहे.
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