तीन नए आपराधिक कानूनों के लागू होने के बाद जम्मू कश्मीर पुलिस कनेक्टिविटी इश्यू से जूझ रही है. रविवार को करीब दो घंटे तक चली बैठक में डीजी स्वैन ने कहा कि उनके जांच अधिकारियों को ई-साक्ष्य ऐप के तहत लॉकर तक पहुंचने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, जिसके लिए जम्मू-कश्मीर के पुलिस स्टेशनों की ओर से इस्तेमाल किए जा रहे नेटवर्क (जियो) के नेटवर्क को मजबूत करने की जरूरत है.
केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा की गई. सभी केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों और महानिदेशकों ने 1 जुलाई को शुरू की गई भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के क्रियान्वयन में आने वाली शुरुआती समस्याओं पर चर्चा की. बैठक में जम्मू-कश्मीर पुलिस के महानिदेशक आरआर स्वैन भी मौजूद थे.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर के एक सीनियर अधिकारी ने बताया कि ज़्यादातर इलाकों में सिर्फ़ एयरटेल और बीएसएनएल की केबल लाइनें ही लगी हैं, लेकिन दूरदराज के इलाकों में नेटवर्क की समस्या है, जहां सिर्फ़ जियो के ऑप्टिकल फाइबर लगाए गए हैं. अधिकारी ने बताया कि एनआईसी (नेशनल इन्फ़ॉर्मेटिक्स सेंटर) के इन सभी ऐप में जब भी दूरदराज के इलाकों में तैनात पुलिसकर्मी दस्तावेज़ अपलोड करते हैं, तो ऐप जियो नेटवर्क को अथॉराइज्ड नहीं करता. इसलिए हमने बैठक में इस मुद्दे को उठाया है और समाधान के लिए एनआईसी के अधिकारियों के साथ समन्वय कर रहे हैं.
वहीं, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एनआईसी से जम्मू-कश्मीर में एक तकनीकी टीम भेजने को कहा है, ताकि ई-साक्ष्य के साथ बड़ी ऑडियो-विजुअल फाइलों को समन्वयित करने में आने वाली चुनौतियों का समाधान किया जा सके. ई-सबूत एक मोबाइल बेस्ड एप्लीकेशन है, जो पुलिस को अपराध स्थल को रिकॉर्ड करने में मदद करता है. साथ ही, ई-सिग्नेचर, SMS नोटिफिकेशन, न्याय सेतु, न्याय श्रुति और ई-कोर्ट जैसी सेवाओं से संबंधित तकनीकी मुद्दों पर भी चर्चा की जा सके.
मामले से परिचित एक अधिकारी ने कहा कि केंद्र ने ये भी कहा है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेशों को अपने सामने आ रहे मुद्दों को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट के समक्ष उठाना चाहिए. करीब दो घंटे तक चली बैठक में डीजी स्वैन ने कहा कि उनके जांच अधिकारियों को ई-साक्ष्य ऐप के तहत लॉकर तक पहुंचने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, जिसके लिए जम्मू-कश्मीर के पुलिस स्टेशनों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे नेटवर्क (जियो) को व्हाइटलिस्ट में शामिल करने की जरूरत है.
अधिकारी ने कहा कि स्वैन ने बताया कि कम बैंडविड्थ की उपलब्धता भी फाइल डाउनलोड करने में समस्या पैदा कर रही है. उनकी कुछ समस्याओं का समाधान कर दिया गया है, जबकि अन्य समस्याओं को एनआईसी की ओर से एक्टिव रूप से संबोधित किया जा रहा है. दो घंटे से अधिक समय तक चली बैठक में लद्दाख के अतिरिक्त डीजीपी एसडी सिंह जामवाल ने कहा कि उन्हें ई-सक्षम ऐप के साथ कुछ डेटा सिंक्रोनाइजेशन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.
अधिकारी ने बताया कि बैठक में जामवाल ने यह भी बताया कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय में पहले से ही सुनवाई के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की व्यवस्था है, जिसे वे ई-साक्ष्य के साथ जोड़ेंगे. उन्होंने ई-कोर्ट प्रणाली को लागू करने के लिए न्यायपालिका के साथ मॉक सेशन की आवश्यकता भी बताई है.
गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि एनआईसी ने नए आपराधिक कानूनों के तहत अपराध स्थलों की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी, न्यायिक सुनवाई और इलेक्ट्रॉनिक रूप से अदालती समन भेजने की सुविधा के लिए ई-साक्ष्य, न्याय श्रुति और ई-समन नाम के एप्लीकेशन डेवलप किए हैं.
ई-साक्ष्य एक मोबाइल-आधारित एप्लिकेशन है जो पुलिस को आपराधिक मामले में अपराध, खोज और जब्ती के दृश्य को रिकॉर्ड करने और फ़ाइल को क्लाउड-आधारित प्लेटफ़ॉर्म पर अपलोड करने की अनुमति देता है. प्रत्येक रिकॉर्डिंग लगभग चार मिनट लंबी होती है और प्रत्येक एफआईआर के लिए ऐसी कई फाइलें अपलोड की जाएंगी.
ई-सक्षम ऐप, जो अपराध स्थलों की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी की सुविधा देता है, साथ ही ऑनबोर्डिंग दस्तावेजों को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस विभागों के साथ शेयर किया गया है. सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने इसकी टेस्टिंग की है.
न्याय श्रुति एक ऐसा ऐप है, जो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से न्यायिक सुनवाई की सुविधा देता है, साथ ही ऑनबोर्डिंग दस्तावेजों को सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों और भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय की ई-समिति के साथ अदालतों में कार्यान्वयन के लिए साझा किया गया है. ई-समन ऐप इलेक्ट्रॉनिक रूप से अदालती समन की डिलीवरी की सुविधा देता है.