केदारनाथ-बद्रीनाथ धाम में जैन, सिख और बौद्ध धर्म के लोगों को प्रवेश की छूट, मुसलमान और ईसाई की एंट्री रहेगी बंद!
श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति ने कहा कि प्रस्तावित गैर-हिंदुओं के प्रवेश प्रतिबंध में जैन, सिख और बौद्ध धर्मावलंबी शामिल नहीं होंगे. यह प्रतिबंध केवल मुसलमान और ईसाइयों पर लागू होगा, जिससे विवाद शुरू हो गया है.
उत्तराखंड की श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि 47 प्रमुख मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रस्तावित प्रतिबंध में जैन, सिख और बौद्ध धर्मावलंबी छूट पाएंगे. समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत हिंदू की परिभाषा में ये धर्म शामिल हैं. हालांकि, प्रस्ताव पर विवाद जारी है और विपक्ष ने इसे ध्यान भटकाने की रणनीति बताया है. अब यह प्रस्ताव जनवरी के अंत या फरवरी की शुरुआत में बोर्ड बैठक में विचाराधीन होगा.
गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रस्ताव
BKTC ने कहा कि गैर-हिंदुओं के प्रवेश को प्रतिबंधित करने का उद्देश्य मंदिरों की पवित्रता बनाए रखना है. अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी के अनुसार, ये मंदिर पर्यटन स्थल नहीं बल्कि सनातन धर्म के सर्वोच्च आध्यात्मिक केंद्र हैं. उन्होंने कहा कि प्रशासन और पुरोहितों का मानना है कि गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक आवश्यक है. प्रस्ताव में केवल मुसलमान और ईसाइयों को शामिल किया गया है, जबकि जैन, सिख और बौद्ध धर्मावलंबी मुक्त होंगे.
विवाद और आलोचना
इस प्रस्ताव की घोषणा के बाद विपक्षी कांग्रेस ने इसे ध्यान भटकाने की रणनीति बताया. कांग्रेस के राज्य अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा कि यह सरकार का असली मुद्दों से ध्यान हटाने का प्रयास है. वहीं, देहरादून स्थित मुस्लिम सेवा संगठन ने इसे असंवैधानिक बताया और कहा कि यह देश की संयुक्त संस्कृति को नुकसान पहुंचा सकता है.
समिति का बचाव
हेमंत द्विवेदी ने प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर परंपरागत रूप से रोक रही है. उन्होंने बताया कि राज्य में 'लैंड जिहाद' और मजारों के निर्माण जैसी घटनाएं सामने आई हैं. इसलिए मंदिरों की पवित्रता बनाए रखने के लिए कठोर कदम उठाना आवश्यक है ताकि देवभूमि का मूल चरित्र सुरक्षित रहे.
भविष्य की प्रक्रिया
BKTC के अनुसार, यह प्रस्ताव बोर्ड बैठक में पारित होने के बाद ही लागू होगा. इससे मंदिरों के प्रशासनिक नियमों में स्पष्टता आएगी और गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर औपचारिक प्रतिबंध तय होगा. इससे मंदिरों की पवित्रता की रक्षा और श्रद्धालुओं के विश्वास को मजबूत करने की कोशिश की जाएगी.
धार्मिक और सामाजिक प्रभाव
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रस्ताव धार्मिक दृष्टि से मंदिरों की परंपरा का पालन करता है, लेकिन समाज में इसका व्यापक असर भी होगा. इसके चलते राज्य में धार्मिक बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच सामाजिक और राजनीतिक बहस बढ़ सकती है. समिति ने आश्वासन दिया है कि निर्णय संविधान और कानून के अनुरूप होगा.