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क्या खतरनाक दिशा में बढ़ रही देश की राजनीति? महाराष्ट्र-झारखंड में रेवड़ी कल्चर हुआ हिट, अब दिल्ली की बारी!

लोकसभा चुनावों में महायुति का जो हाल देखने को मिला था उसने यह बता दिया था कि इस बार सत्ता परिवर्तन होकर रहेगा लेकिन चुनाव प्रचार खत्म होते-होते मानों महाराष्ट्र की पूरी हवा ही बदल गई. ऐन मौके पर आखिर ऐसा क्या हुआ जो महायुति ने पूरा गेम ही पलट कर रख दिया. इसका पूरा श्रेय महायुति के चुनावी वादों को जाता है, जिसे आम तौर पर 'रेवड़ी कल्चर' कहा जाता है.

Sagar Bhardwaj

Rewari Culture: महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजों की स्थिति कमोवेश साफ हो चुकी है. दोनों ही राज्यों में पिछली सरकारें ही सत्ता में लौट रही हैं. झारखंड को अगर थोड़ा साइड में रखें तो महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार के शुरुआती दौर में इस बार सत्ता परिवर्तन की चर्चा जोरों पर थी. बड़े-बड़े चुनावी पंडित मानकर चल रहे थे कि इस बार सत्ता परिवर्तन तय है. लोकसभा चुनावों में महायुति का जो हाल देखने को मिला था उसने भी यह बता दिया था कि इस बार सत्ता परिवर्तन होकर रहेगा लेकिन चुनाव प्रचार खत्म होते होते मानों महाराष्ट्र की पूरी हवा ही बदल गई. ओपिनियन पोल से लेकर हरेक चुनावी पंडित साफ तौर पर कह रहा था कि अब राज्य में महायुति की सरकार बननी तय है.
 
ऐन मौके पर आखिर ऐसा क्या हुआ जो महायुति ने पूरा गेम ही पलट कर रख दिया. इसका पूरा श्रेय महायुति के चुनावी वादों को जाता है, जिसे आम तौर पर 'रेवड़ी कल्चर' कहा जाता है.

महायुति की जीत ने साबित कर दिया कि देश में रेवड़ी कल्चर हिट नहीं सुपरहिट हो रहा है, लेकिन देश का वास्तव में हित सोचने वाले लोगों के लिए यह बेहद चिंता का विषय है.

क्योंकि रेवड़ी कल्चर किसी पार्टी के लिहाज से तो ठीक हो सकता है लेकिन जिस देश की ज्यादातर आबादी मूलभूत जरूरतों के लिए तरस रही हो उस देश के लिए यह कल्चर बेहद घातक साबित हो सकता है.

रेवड़ी कल्चर क्या है और क्यों है खतरनाक
रेवड़ी कल्चर का मतलब है कि  जनता को मुफ्तखोरी की लत लगाना. सरकारें चुनाव जीतने के लिए बड़े बड़े वादे करती हैं और फिर जिस करदाता के पैसे को देश के विकास में इस्तेमाल होना चाहिए उस पैसे से उन मुफ्तखोरी के वादों को पूरा किया जाता है. यह स्थिति खतरनाक है इससे राज्य के संसाधनों पर बेहिसाब बोझ पड़ता है और राज्य पर लगातार कर्ज बढ़ता चला जाता है.

जरा सोचिए महाराष्ट्र पर इस वक्त 7 लाख करोड़ से ज्यादा का कर्ज है. ऐसे में महायुति ने जो बड़े-बड़े चुनावी वादे किए हैं उन वादों को पूरा करने में उसे किस हद तक कर्ज लेना होगा. यहां यह बात भी जानना जरूरी है कि रेवड़ी कल्चर के जरिए भोली-भाली जनता को मूर्ख बनाया जाता है.

क्योंकि मुख्तखोरी समझकर जनता सरकार से जो भी फायदे लेती है वह सब जनता के पैसे से ही जनता को दिए जाते हैं. अगर सरकार आपको मुफ्त में कुछ बांट रही है तो वह राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए कहीं न कहीं इसकी कटौती जरूर करेगी.

रेवड़ी कल्चर हुआ हिट तो क्या होगा
महाराष्ट्र रेवड़ी कल्चर का पहला उदाहण नहीं है. बीते कुछ सालों से रेवड़ी कल्चर एक ट्रेंड बनता जा रहा रहा है. अगर यह रेवड़ी कल्चर हिट हो गया तो हरके पार्टी चुनाव जीतने के लिए रेवड़ी कल्चर को ही हथियार बना लेगी और देश कर्ज तले डूबता चला जाएगा. अगले साल दिल्ली में भी विधानसभा का चुनाव है. महाराष्ट्र के बाद अब दिल्ली में भी रेवड़ी कल्चर के तहत बड़ी-बड़ी चुनावी घोषणाएं सुनने को मिल सकती हैं.

क्या सभी घोषणाएं होती हैं फ्रीबीज या रेवड़ी कल्चर

सभी घोषणाओं को फ्रीबीज या रेवड़ी कल्चर नहीं कहा जा सकता है. कुछ घोषणाएं जैसे बिजली, पानी, जल, शिक्षा, स्वास्थ्य को लेकर की गई घोषणा   किसी भी इंसान की मूलभूत जरूरतें हैं. ऐसी घोषणाएं करना समाज के उत्थान के लिहाज से बेहतर हैं.

लेकिन रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के मुताबिक, वे योजनाएं जिनसे क्रेडिट कल्चर कमजोर हो, सब्सिडी की वजह से कीमतें बिगड़ें और प्राइवेट इन्वेस्ट में गिरावट आए और लेबर फोर्स की भागीदारी कम हो उन्हें फ्रीबीज कहा जाता है. आम तौर पर फ्रीबीज या रेवड़ी कल्चर का ऐलान चुनाव से पहले किया जाता है जबकि कल्याणकारी योजनाएं या वेलफेयर स्कीम्स किसी भी समय लागू कर दी जाती हैं.

रेवड़ी कल्चर राज्य को दिवालिया या कंगाल कर सकता है. पिछले साल आरबीआई ने एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें कहा गया था कि राज्य सरकारें मुफ्त की योजनाओं पर जमकर खर्च कर  रही हैं जिससे वो कर्ज के जाल में फंसती जा रही हैं. 'स्टेट फाइनेंस: अ रिस्क एनालिसिस' नाम की इस रिपोर्ट में जिस पांच राज्यों का नाम ता उनमें पंजाब, राजस्थान, बिहार, केरल का नाम शामिल था. ये वो राज्य हैं जिनपर अंधाधुंध कर्ज है और अगर रेवड़ी कल्चर बंद नहीं हुआ तो देश के कई राज्य आने वाले समय में इस रिपोर्ट का हिस्सा हो सकते हैं.