समुद्र में भारत का बढ़ा दम, INS अरिधमन से चीन-पाकिस्तान की बढ़ेगी बेचैनी; समुद्री सुरक्षा और अधिक पुख्ता
मई 2026 तक तीसरी परमाणु पनडुब्बी 'आईएनएस अरिधमन' के शामिल होने से भारत की समुद्री सुरक्षा एक नए युग में प्रवेश करेगी. तीन स्वदेशी एसएसबीएन (SSBN) के साथ भारत अब हिंद महासागर में दुश्मन पर 24/7 परमाणु निगरानी रखने और अचूक 'द्वितीय-प्रहार' करने में सक्षम होगा.
नई दिल्ली: भारत अपनी समुद्री परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को उस ऐतिहासिक मोड़ पर ले आया है, जहां से क्षेत्रीय संतुलन पूरी तरह बदलने वाला है. मई 2026 तक नौसेना के बेड़े में तीसरी स्वदेशी अरिहंत-श्रेणी की पनडुब्बी 'आईएनएस अरिधमन' के शामिल होने की उम्मीद है. इसके साथ ही भारत की सामरिक बल कमान के पास तीन ताकतवर एसएसबीएन संचालित करने की क्षमता होगी. यह उपलब्धि ऐसे समय में आ रही है जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन अपनी परमाणु ताकत तेजी से बढ़ा रहा है और पाकिस्तान भी चीन से प्राप्त आधुनिक एआईपी (AIP) पनडुब्बियों के साथ अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है.
भारत के परमाणु त्रिकोण की शुरुआत अगस्त 2016 में आईएनएस अरिहंत के साथ हुई थी. विशाखापत्तनम में निर्मित 6,000 टन की इस पनडुब्बी ने 2018 में अपनी पहली गश्त पूरी कर भारत की सामरिक गहराई को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया. इसी कड़ी में 29 अगस्त 2024 को शामिल हुई 'आईएनएस अरिघात' ने रोटेशनल तैनाती की सुविधा प्रदान की है. उन्नत सोनार प्रणालियों और K-4 मिसाइलों से लैस अरिघात हिंद महासागर की गहराइयों से किसी भी रणनीतिक लक्ष्य को नेस्तनाबूद करने की क्षमता रखती है.
अरिधमन: विनाशक क्षमता का विस्तार
आगामी 'आईएनएस अरिधमन' न केवल आकार में 7,000 टन के साथ सबसे बड़ी है, बल्कि यह तकनीक में भी अपने पूर्ववर्तियों से कहीं आगे है. इसमें वर्टिकल लॉन्च ट्यूबों की संख्या को बढ़ाकर आठ कर दिया गया है, जिससे यह 24 K-15 या 8 K-4 मिसाइलें ले जाने में सक्षम होगी. भविष्य में इसे 6,000 किमी रेंज वाली K-5 मिसाइल से भी लैस करने की योजना है. खास बात यह है कि इसका सात-ब्लेड वाला प्रोपेलर और उन्नत ध्वनि-अवरोधक तकनीक इसे दुश्मन के रडार और सोनार के लिए 'अदृश्य' बना देती है.
चीन-पाकिस्तान की चुनौती और भारत की तैयारी
विशाखापत्तनम के 'प्रोजेक्ट वर्षा' से संचालित होने वाली ये पनडुब्बियां भारत की 'मिनिमम क्रेडिबल डिटरेंस' नीति का आधार हैं. हालांकि चीन के पास 60 से अधिक पनडुब्बियों का बड़ा बेड़ा है, लेकिन भारत गुणवत्ता, गुप्तता और विश्वसनीय 'सेकंड-स्ट्राइक' क्षमता पर ध्यान केंद्रित कर रहा है. 2027-28 तक रूसी अकुला-श्रेणी और प्रोजेक्ट-75I की नई पनडुब्बियों के आने से भारत की समुद्री सीमाएं एक अभेद्य दीवार में तब्दील हो जाएंगी.
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