समंदर में खतरा, हिफाजत के लिए चाहिए परमाणु हथियारों से लैस सबमरीन, सरकार से क्या चाह रही है नौसेना?
Nuclear Powered Submarines: समंदर में चीन की बढ़ती ताकत को देखते हुए इंडियन नेवी ने मोदी सरकार से न्यूक्लियर एनर्जी से चलने वाले दो सबमरीन की डिमांड की है. इसके लिए प्रस्ताव भेजा जा चुका है. कहा जा रहा है कि इस प्रॉसेस में पहला कदम ये होगा कि डिफेंस मिनिस्ट्री, इंडियन नेवी को अनिवार्यता की स्वीकृति या AON प्रदान करेगा.
Nuclear Powered Submarines: यूक्रेन के साथ रूस के युद्ध के कारण इंडियन नेवी की पनडुब्बी बेड़े को बढ़ाने की योजना 'प्रोजेक्ट डेल्टा' में देरी हो रही है. इसे देखते हुए इंडियन नेवी नेे भारत-प्रशांत क्षेत्र में देश के विरोधियों को रोकने के लिए न्यूक्लियर एनर्जी से चलने वाले दो पनडुब्बियों यानी सबमरीन के निर्माण की मंजूरी मांगी है.
मोदी सरकार की ओर से 2015 में स्वीकृत 30 साल पुरानी पनडुब्बी योजना में इंडो-पैसिफिक में छह SSN को मंजूरी दी गई है, लेकिन पहला कदम दो एसएसएन के लिए आवश्यकता की स्वीकृति (एओएन) है. इस मामले को शीर्ष स्तर पर उठाया गया है और प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए परामर्श जारी है.
फिलहाल इंडियन नेवी के पास सबमरीन की क्या है स्थिति
हाल ही में खबर आई थी कि भारत की परमाणु ऊर्जा से चलने वाली परमाणु मिसाइल से लैस दूसरी सबमरीन, एसएसबीएन (बैलिस्टिक मिसाइलों से लैस परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बी) आईएनएस अरिघाट को जल्द ही नौसेना में शामिल किया जाएगा, जबकि पहली एसएसबीएन आईएनएस अरिहंत पहले से ही इंडो-पैसिफिक के गहरे पानी में गश्त कर रही है. भारत की तीसरी एसएसबीएन, आईएनएस अरिदमन भी देश की मजबूत परमाणु तिकड़ी के हिस्से के रूप में अगले साल की शुरुआत में नौसेना में शामिल होने के लिए तैयार है.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूसी अकुला कैटेगरी के एसएसएन (इसे प्रोजेक्ट डेल्टा कहा गया था) के प्रस्तावित पट्टे में यूक्रेन युद्ध में रूस की व्यस्तता और तकनीकी प्रतिबंधों के कारण देरी हुई है, जो कम से कम 2028 तक खींच सकता है. ऐसे में इंडियन नेवी ने मुंबई के मझगांव डॉकयार्ड में तीन और कलवेरी (स्कॉर्पीन) कैटेगरी की डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों का निर्माण करने के बाद SSN निर्माण करने का निर्णय लिया है.
आखिर इंडियन नेवी को SSN की जरूरत क्यों?
इंडियन नेवी की ओर से परमाणु ऊर्जा से चलने वाली हमलावर पनडुब्बी (SSN) को चुनने का मुख्य कारण यह है कि पारंपरिक हमलावर पनडुब्बियां हर दूसरे दिन बैटरी रिचार्ज करने के लिए सतह पर आती हैं. SSN की गति पानी के नीचे 20 नॉट है, लेकिन डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां हवा से स्वतंत्र प्रणोदन (Independent propulsion) के साथ भी केवल चार से पांच नॉट दर्ज करती हैं.
ये देखते हुए कि चीनी नौसेना ने हिंद महासागर में लंबी दूरी की गश्ती भेजने की योजना बनाई है और उसने पाकिस्तान को युआन-क्लास एसएसके से पहले ही लैस कर दिया है. भारत को इन दुश्मनों से लड़ने की क्षमता विकसित करने और उन्हें मुहंतोड़ जवाब देने की जरूरत है. पिछले साल पाकिस्तान के साथ एक नेवी एक्सरसाइज में एक चीनी सोंग क्लास पनडुब्बी ने भाग लिया था, जिसमें पनडुब्बी ने पाकिस्तानी नौसेना के लिए एक हमले के प्रदर्शन के हिस्से के रूप में कराची बंदरगाह पर नीचे की ओर अभ्यास किया था. बांग्लादेश ने भी चीन से दो मिंग-क्लास पनडुब्बियां हासिल की हैं.
SSN पर ध्यान केंद्रित करने का एक और कारण ये भी है कि भारत के पहले चार SSBN (बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां) अरिहंत कैटेगरी के हैं, 750 किलोमीटर रेंज की के-15 बैलिस्टिक मिसाइलों से लैस होंगे, जबकि अगली श्रेणी 3000 किलोमीटर रेंज की के-4 बैलिस्टिक मिसाइलों से लैस होगी.
भारत को SSN की आवश्यकता है क्योंकि चीनी पनडुब्बियां QUAD सहयोगी ऑस्ट्रेलिया के तट से दूर ओम्बई-वेटर जलडमरूमध्य का उपयोग करके हिंद महासागर में बिना किसी पहचान के प्रवेश कर रही हैं और 90 डिग्री पूर्वी रिज के साथ-साथ दक्षिण हिंद महासागर, अफ्रीका के पश्चिमी तट तक का सर्वेक्षण कर रही हैं.