सिंधु जल संधि पर भारत का इंटरनेशनल मध्यस्थता कोर्ट का आदेश मानने से इनकार, पाकिस्तान की उड़ी नींद
भारत का कहना है कि मौजूदा हालात में संधि को पहले की तरह लागू मानना सही नहीं है. सरकार के मुताबिक, संधियां जमीनी सच्चाइयों से अलग नहीं हो सकतीं.
भारत ने सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) से जुड़े मामले में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत के आदेश को मानने से इनकार कर दिया है. हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (COA) ने हाल ही में भारत से उसके जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े कुछ दस्तावेज मांगे थे, लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि वह इस प्रक्रिया में शामिल नहीं होगा.
दरअसल, सीओए ने पिछले सप्ताह भारत से बगलीहार और किशनगंगा जलविद्युत परियोजनाओं के संचालन से संबंधित “पोंडेज लॉगबुक” जमा करने को कहा था. यह मांग मामले के तथाकथित “दूसरे चरण” के तहत की गई है. अदालत ने 2 और 3 फरवरी को हेग के पीस पैलेस में सुनवाई तय की है. अदालत का कहना है कि भारत ने न तो कोई जवाबी दस्तावेज दाखिल किया है और न ही अपनी भागीदारी के संकेत दिए हैं.
अदालत को वैध नहीं मानता भारत
सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत इस अदालत को वैध नहीं मानता. एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह मध्यस्थता अदालत गलत तरीके से बनाई गई है और यह निष्पक्ष विशेषज्ञ के समानांतर काम कर रही है. भारत का मानना है कि ऐसे मामलों को निष्पक्ष विशेषज्ञ के जरिए सुलझाया जाना चाहिए, न कि अलग-अलग मंचों पर. इसी वजह से भारत सीओए की किसी भी चिट्ठी या आदेश का जवाब नहीं दे रहा है.
पहलगाम हमले के बाद सिंधु जल संधि स्थगित
यह पूरा विवाद अप्रैल 2025 के बाद और गहरा गया, जब भारत ने सिंधु जल संधि को अस्थायी रूप से स्थगित करने का फैसला किया था. यह फैसला पहलगाम में हुए आतंकी हमले के एक दिन बाद लिया गया, जिसमें 26 नागरिकों की जान गई थी. भारत ने साफ संकेत दिया कि जब तक सीमा पार से आतंकवाद जारी रहेगा, तब तक सहयोग संभव नहीं है.
सिंधु नदी पर निर्भर पाकिस्तान की खेती
दूसरी ओर, पाकिस्तान ने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की कोशिश तेज कर दी है. उसने कई देशों में प्रतिनिधिमंडल भेजे हैं और कानूनी कदम भी उठाए हैं. पाकिस्तान की खेती सिंधु नदी प्रणाली पर काफी हद तक निर्भर है और उसके बड़े बांधों में जल स्तर बेहद कम बताया जा रहा है.
मौजूदा हालात में संधि को पहले की तरह लागू करना सही नहीं
भारत का कहना है कि मौजूदा हालात में संधि को पहले की तरह लागू मानना सही नहीं है. सरकार के मुताबिक, संधियां जमीनी सच्चाइयों से अलग नहीं हो सकतीं. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की गैर-भागीदारी के कारण सीओए की कार्यवाही एकतरफा बन सकती है और इसका कोई ठोस समाधान निकलना मुश्किल होगा.