भारत के सबसे गर्म जिले में सुबह 10 बजते ही पसर जाता है सन्नाटा, खेतों में रात में काम करने को मजबूर किसान

लगातार दर्ज किए गए तापमान के आंकड़ों ने बांदा को भारत के सबसे भीषण गर्मी वाले क्षेत्रों में शामिल कर दिया है.

भारत का सबसे गर्म जिला बांदा
Sagar Bhardwaj

घड़ी में जैसे ही सुबह के 10 बजते हैं, वैसे ही बांदा जिले में शटडाउन हो जाता है. इतनी भीषण गर्मी पड़ रही है कि कोई भी अपने घर से बाहर निकलने को राजी नहीं.  अट्टारा कस्बे के एक जौहरी लखन गुप्ता कहते हैं कि वह सुबह 6 बजे घर से बाहर निकले हैं और 9 बजे तक घर वापस आ जाता हैं. 10 बजे तर सड़कें बिल्कुल खाली हो जाती हैं. उन्होंने बताया कि उनकी दुकान का शटर खुला रहता है लेकिन शाम से पहले इक्का-दुक्का ग्राहक ही दुकान पर आते हैं.

10 बजे के बाद धूल फांकने लगती हैं सड़कें

गुप्ता ने कहा कि अप्रैल से मैंने कुछ नहीं बेचा है. 10 बजे के बाद बांदा की सड़कें धूल फांकने लगती हैं. पहले एक-दो लोग बाहर दिखते हैं, फिर जैसे-जैसे दिन चढ़ता है, सन्नाटा छा जाता है. इस साल 27 अप्रैल को बांदा का तापमान 47.6 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो कि उस दिन पूरे भारत में किसी भी जगह से सर्वाधिक था और 1951 के बाद सर्वाधिक था. इसी के साथ इसने अप्रैल महीने के अपने पिछले सर्वाधिक उच्चतम स्तर 47.4 डिग्री सेल्सियस को भी पार कर दिया जो 30 अप्रैल 2022 और 25 अप्रैल 2026 को पहुंचा था. मंगलवार को बांदा ने 48.2 डिग्री सेल्सियस तापमान के साथ एक और नया रिकॉर्ड बनाया.

लगातार दर्ज किए गए तापमान के आंकड़ों ने बांदा को भारत के सबसे भीषण गर्मी वाले क्षेत्रों में शामिल कर दिया है. यह स्थिति लंबे समय से राजस्थान के चुरू और जैलसमेर जैसे शहरों से जुड़ी हुई है. शोधकर्ताओं का कहना है कि जिले की यह संवेदनशीलता न केवल जलवायु संकत के बढ़ते प्रभावों को दर्शाती है बल्कि वर्षों से हो रहे स्थानीय पारिस्थितिक विनाश का भी परिणाम है जिसने उस प्राकृतिक सिस्टम को नष्ट कर दिया है जो कभी यहां के जलवायु को नियंत्रित करता था.

खेतों में रात में काम कर रहे किसान

स्थानीय लोगों का कहना है कि तापमान बढ़ने के कारण लोगों के काम करने के तरीके व्यापक रूप से बदल रहे हैं. इस वर्ष किसानों ने एलईडी फ्लडलाइट की रोशनी में रात में खेतों में काम करना शुरू कर दिया है क्योंकि दिन में काम करना असहनीय हो गया था. ठेकेदारों का कहना है कि मजदूर सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे काम करने के बजाय अपनी मजदूरी का 40 प्रतिशत तक छोड़ने को तैयार हैं. पलायन सामान्य से पहले ही शुरू हो गया है. जो खाने पीने की दुकाने पहले दोपहर तक खुली रहती थी वो अब देर रात तक खुली रहती हैं.

'अब इस पर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है'

गांव के ही निवासी प्रहलाद वाल्मीकि, जिनकी पत्नी प्रधान हैं, कहते हैं कि अब इस पर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है, अन्यथा बांदा रहने लायक नहीं रहेगा. उन्होंने बताया कि उन्होंने गर्मी का पूरा मौसम, पड़ोसियों की गर्मी, पानी और खराब फसलों से जुड़ी शिकायतों को सुनने में जुटाया है. शाम होते-होते अट्टारा बाजार में फिर से रौनक लौटकी है, चाय की दुकानें फिर से खुलने लगती हैं और पूरी दुपहरी खाली पड़ी सड़कों पर फिर से वाहन दौड़ने लगते हैं और लखन गुप्ता की दुकान पर ग्राहक फिर से लौटने लगते हैं.