एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में सामने आया है कि दुनिया में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशकों से होने वाली कुल जहरीलेपन (टोटल एप्लाइड टॉक्सिसिटी) का करीब 70% हिस्सा सिर्फ चार देशों- भारत, चीन, ब्राज़ील और अमेरिका से आता है. यह जहरीलापन सिर्फ खेत के कीटों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मधुमक्खियों, मछलियों, मिट्टी के जीवों और पौधों जैसी कई उपयोगी प्रजातियों को भी नुकसान पहुंचाता है.
2022 में हुए संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन (United Nations Biodiversity Conference) में देशों ने 2030 तक कीटनाशक जोखिम 50% घटाने का वादा किया था लेकिन वैज्ञानिक पत्रिका Science में प्रकाशित शोध के अनुसार दुनिया इस लक्ष्य से काफी पीछे है. 2013-2019 के बीच 65 देशों में 600 से अधिक कीटनाशकों के उपयोग का विश्लेषण किया गया और पाया गया कि जहरीलापन घटने के बजाय बढ़ा है.
अध्ययन के मुताबिक फल-सब्जी, मक्का, सोयाबीन, चावल और अन्य अनाज वाली फसलों पर कीटनाशकों का सबसे अधिक उपयोग होता है. इससे खेत के कीट तो मरते हैं, लेकिन अन्य जीव भी प्रभावित होते हैं. सबसे ज्यादा नुकसान जमीन पर रहने वाले छोटे कीट-जीवों (आर्थ्रोपोड), फिर मिट्टी के जीवों और मछलियों को पाया गया.
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में कीटनाशक नियंत्रण के नियम पुराने हो चुके हैं. Insecticides Act 1968 मुख्यतः खेती के उपयोग पर केंद्रित है, जबकि आज कीटनाशक घरों, फर्नीचर, अनाज भंडारण और निर्माण कार्यों में भी इस्तेमाल हो रहे हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि भारत में कई ऐसे कीटनाशक उपयोग में हैं, जो यूरोप जैसे क्षेत्रों में प्रतिबंधित हैं.
सरकार नया Pesticides Management Bill 2025 लाने की तैयारी में है, जिसका उद्देश्य पर्यावरण और लोगों पर खतरा कम करना है. विशेषज्ञों का सुझाव है कि खेती में कम जहरीले या जैविक विकल्प अपनाने और कीटनाशकों के उपयोग का सही डेटा रखने से ही स्थिति सुधर सकती है.
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि अभी कदम नहीं उठाए गए, तो जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य दोनों पर बड़ा संकट आ सकता है. केवल चिली ही 2030 का लक्ष्य पाने की राह पर दिख रहा है. इसलिए टिकाऊ खेती और कम जहरीले रसायनों की ओर बदलाव को जरूरी बताया गया है.