दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के उम्मीदवार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों के बराबर आयु सीमा में छूट या अधिक प्रयासों की मांग नहीं कर सकते. जस्टिस अनिल छत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की पीठ ने यह टिप्पणी उन ईडब्ल्यूएस उम्मीदवारों की याचिका खारिज करते हुए की, जिन्होंने सिविल सेवा परीक्षा में एससी/एसटी की तरह छूट की मांग की थी. कोर्ट ने कहा कि दोनों श्रेणियों की वंचना एक जैसी नहीं है.
अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि ईडब्ल्यूएस श्रेणी, जिसे 2019 में 103वें संशोधन के तहत लाया गया था, एससी, एसटी और ओबीसी श्रेणियों से बिल्कुल अलग है. पीठ ने कहा, “जाति, आर्थिक स्थिति के विपरीत परिवर्तनशील नहीं है; यह जन्म से ही निर्धारित होती है.” कोर्ट ने आगे समझाया कि जातिगत वंचना जीवन भर के लिए होती है, जबकि आर्थिक अभाव अस्थायी हो सकता है. ईडब्ल्यूएस व्यक्ति को जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, वे केवल वित्तीय संसाधनों की कमी से उत्पन्न होती हैं, न कि सामाजिक कलंक या ऐतिहासिक बहिष्कार से. यही कारण है कि संविधान निर्माताओं ने जाति-आधारित आरक्षण को आर्थिक-आधारित आरक्षण से अलग रखा है.
याचिकाकर्ता ईडब्ल्यूएस उम्मीदवारों ने केंद्रीय स्तर पर सीधी भर्ती और संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा 2024 की अधिसूचना को चुनौती दी थी. उनका तर्क था कि जब संविधान के 103वें संशोधन के तहत उन्हें 10 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है, तो उन्हें एससी/एसटी/ओबीसी की तरह आयु सीमा में छूट और प्रयासों की अधिकतम संख्या बढ़ाने का भी अधिकार मिलना चाहिए. उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (अवसर की समानता) का उल्लंघन बताया. हालांकि, अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता इस बात का पुख्ता सबूत पेश करने में असफल रहे कि ईडब्ल्यूएस को ये छूट न देना मनमाना या असंवैधानिक है.
याचिकाकर्ताओं ने यह दलील भी दी कि कुछ राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने ईडब्ल्यूएस उम्मीदवारों को आयु छूट दे रखी है, इसलिए केंद्र सरकार पर भी ऐसा करने की बाध्यता बनती है. इस पर अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सिर्फ इसलिए कि कुछ राज्यों ने ऐसा फैसला किया है, इसका यह मतलब नहीं कि केंद्र सरकार भी उसी नीति को अपनाने के लिए मजबूर है. पीठ ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार की यह नीति किसी भी तरह से बदनीयत, मनमानी या असंवैधानिक नहीं है. हालांकि, कोर्ट ने यह स्वीकार किया कि वह उन सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं से अनजान नहीं है, जिनके आधार पर ईडब्ल्यूएस का वर्गीकरण हुआ है. फिर भी, कानूनी और संवैधानिक आधार पर याचिका को खारिज कर दिया गया.