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Explainer: क्या होता है इलेक्टोरल बॉन्ड का Unique Code, कैसे राजनीतिक पार्टियों के चंदे को करेगा डिकोड?

Electoral Bond Unique Code Explainer: चुनावी बॉन्ड पर आधी-अधूरी जानकारी शेयर करने का आरोप लगाते हुए ADR के वकील आज सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने SBI को लताड़ लगाते हुए पूछा कि ऐसा क्यों हैं कि चुनाव आयोग को पूरी जानकारी नहीं दी गई है. अब मामले की अगली सुनवाई 18 मार्च को की जाएगी.

India Daily Live

Electoral Bond Unique Code Explainer: देश की राजनीतिक पार्टियों को इलेक्टोरल बॉन्ड के रूप में मिलने वाले चंदे की जानकारी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने SBI को आदेश दिया था. गुरुवार शाम को SBI ने चुनावी बॉन्ड से संबंधित जानकारियों को इलेक्शन कमीशन को सौंप दिया, जिसके बाद EC ने शाम को इस डेटा को अपनी वेबसाइट पर अपलोड कर दिया. इस डेटा में जानकारी दी गई कि किस कंपनी ने 2019 से 2024 तक कितने रुपये का इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदा. इसके अलावा, एक ये भी जानकारी दी गई कि इस समय सीमा के अंदर किस राजनीतिक पार्टी ने कितने रुपये के चुनावी बॉन्ड को इनकैश कराया. 

हालांकि, SBI की ओर से इलेक्शन कमीशन को दी गई जानकारी में ये स्पष्ट नहीं हो पाया कि किस कंपनी ने किस पार्टी को कितने रुपये का चुनावी चंदा दिया है. दरअसल, SBI की ओर से इलेक्शन कमीशन को जो जानकारी दी गई, वो आधी-अधूरी थी. दरअसल, इस जानकारी में SBI की ओर से यूनिक अल्फान्यूमेरिक कोड का जिक्र है, नहीं किया गया था. दरअसल, ये ऐसा कोड होता है, जिसके जरिए किस डोनर ने किस पार्टी को कितना चंदा दिया है, वो डिकोड हो जाता है. इस यूनिक कोड को शेयर न करने पर सुप्रीम कोर्ट में आज यानी शुक्रवार को सुनवाई हुई.  

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने SBI को फटकार लगाई और पूछा कि आधा-अधूरा डेटा क्यों शेयर किया गया? सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार तक SBI की ओर से इस मामले पर जवाब मांगा है. ADR यानी एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की ओर से सीनियर वकील प्रशांत भूषण ने ये मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में उठाया. 

क्या होता है यूनिक कोड?

यूनिक कोड, कॉरपोरेट्स कंपनियों की ओर से खरीदे गए चुनावी बॉन्ड पर छपा नंबर होता है. दरअसल, ये सामान्य तौर पर नहीं दिखता है. इसे देखने के लिए अल्ट्रा वॉयलट लाइट्स का यूज करना होता है. कुछ रिपोर्ट्स में यूनिक कोड को सीक्रेट नंबर कहा गया है. यूनिक कोड या फिर सीक्रेट नंबर को बॉन्ड पर छापे जाने के पीछे का तर्क ये था कि इससे ये सुनिश्चित किया जा सके कि कोई नकली चुनावी बॉन्ड चलन में न आए. 

याचिकाकर्ता ADR के वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि चुनावी बॉन्ड जारी करने वाली SBI के पास हर इलेक्टोरल बॉन्ड का एक यूनिक नंबर होता है, जिसके जरिए ये जाना जा सकता है कि किसने कितने रुपये का बॉन्ड खरीदा और उसने किस राजनीतिक पार्टी को इस बॉन्ड को चंदे के रूप में दिया. 

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को सुनवाई करते हुए SBI को 12 मार्च तक इलेक्टोरल बॉन्ड से संबंधित सभी डेटा को चुनाव आयोग को देने का निर्देश दिया था. गुरुवार को SBI की ओर से डेटा मिलने के बाद इसे इलेक्शन कमीशन ने अपनी वेबसाइट पर अपलोड कर दिया. 

2 सेट में SBI ने EC को दी है जानकारी

SBI को 12 अप्रैल 2019 से 15 फरवरी 2024 तक के डेटा चुनाव आयोग को सौंपे हैं. इसे दो सेट में जारी किया गया है. एख सेट में कंपनियों ने किस-किस तारीख को कितने रुपये के चुनावी बॉन्ड खरीदे, इसकी जानकारी है, जबकि दूसरे सेट में तारीख के साथ उन पार्टियों के नाम दर्ज हैं, जिन्होंने अलग-अलग तारीख को कंपनियों की ओर से मिले चुनावी बॉन्ड को इनकैश कराया.