SC पहुंची ममता बनाम चुनाव आयोग की जंग, EC ने लगाए SIR प्रक्रिया में बाधा डालने के आरोप
सुप्रीम कोर्ट में बंगाल के मतदाता सूची संशोधन पर विवाद गहरा गया है. चुनाव आयोग ने ममता सरकार पर अधिकारियों को डराने का आरोप लगाया, वहीं टीएमसी ने सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी बताकर नाम हटाने की साजिश का दावा किया.
नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) का मुद्दा अब कानूनी और राजनीतिक लड़ाई का मुख्य केंद्र बन गया है. सुप्रीम कोर्ट में चल रही इस महत्वपूर्ण सुनवाई के बीच चुनाव आयोग ने शुक्रवार को एक जवाबी हलफनामा दायर कर राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं. आयोग का कहना है कि बंगाल एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ चुनावी ड्यूटी में लगे कर्मचारियों को डराया जा रहा है. इस स्थिति ने राज्य प्रशासन और चुनाव निकाय के बीच कड़वाहट को और बढ़ा दिया है.
चुनाव आयोग ने कोर्ट को विस्तार से बताया कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा और बाधाएं उत्पन्न की गई हैं. आयोग का दावा है कि राज्य सरकार चुनावी अधिकारियों के खिलाफ मिलने वाली धमकियों पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं कर रही है. बीएलओ की शिकायतों के बावजूद अब तक पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की है. अन्य राज्यों की तुलना में बंगाल की स्थिति काफी अलग है, जहाँ अधिकारियों को स्वतंत्र रूप से अपना काम करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.
ममता बनर्जी पर भड़काऊ भाषण का आरोप
लाइव लॉ की रिपोर्ट का हवाला देते हुए आयोग ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भूमिका पर भी अंगुली उठाई है. हलफनामे में आरोप लगाया गया है कि मुख्यमंत्री के भड़काऊ भाषणों ने अधिकारियों के बीच खौफ का माहौल बना दिया है. इसी डर की वजह से कई चुनाव कर्मियों ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) को पत्र लिखकर अपनी ड्यूटी हटाने की गुहार लगाई है. आयोग ने पिछले साल नवंबर की उस घटना का भी जिक्र किया, जब भीड़ ने कार्यालय में घुसकर तोड़फोड़ की और ताला लगा दिया था.
सुरक्षा प्रोटोकॉल और असामान्य स्थिति
पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल कितना तनावपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कियहां के सीईओ को 'वाई प्लस' कैटेगरी की सुरक्षा दी गई है. आयोग ने हलफनामे में स्पष्ट किया कि बंगाल इकलौता राज्य है जहां शीर्ष अधिकारियों को इस स्तर की सुरक्षा व्यवस्था मुहैया करानी पड़ी है. इसके बावजूद अधिकारियों के मनोबल पर बुरा असर पड़ रहा है. आयोग ने कोर्ट को बताया कि सुरक्षा के ये पुख्ता इंतजाम राज्य में स्वतंत्र और निष्पक्ष काम सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य हो गए हैं.
टीएमसी का 'रहस्यमय सॉफ्टवेयर' पर हमला
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव आयोग के इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए जवाबी हमला किया है. पार्टी के राज्यसभा सांसद साकेत गोखले का आरोप है कि आयोग एक 'रहस्यमय खराब सॉफ्टवेयर' का इस्तेमाल कर रहा है. उनका दावा है कि इस सॉफ्टवेयर की तकनीकी खामियों के कारण ही मतदाता सूची से बड़ी संख्या में सही मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं. टीएमसी नेताओं का कहना है कि इस मुद्दे को ममता और अभिषेक बनर्जी कई महीनों से लगातार जोर-शोर से उठाते आ रहे हैं.
वोट काटने की साजिश का दावा
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शुरू से ही इस पूरी एसआईआर प्रक्रिया को संदेह की दृष्टि से देख रही हैं. उनका सीधा दावा है कि आगामी चुनावों से पहले बड़ी संख्या में जानबूझकर उनके समर्थकों के वोट काटे जा रहे हैं, ताकि टीएमसी को राजनीतिक नुकसान पहुँचाया जा सके. ममता बनर्जी ने खुद कोर्ट पहुँचकर अपनी दलीलें पेश की हैं. हालांकि, आयोग इन सभी आरोपों को निराधार बता रहा है. अब सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई ही इस विवाद का कोई समाधान निकालेगी, जिस पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं.
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