संबंध सुधरेंगे या बिगड़ेंगे....मिडटर्म चुनाव में ट्रंप की हार का भारत-अमेरिका के रिश्तों पर क्या होगा असर? जानें
अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा झटका लगा है. डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत के बाद भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है.
अमेरिका में मिडटर्म चुनाव के नतीजों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा राजनीतिक झटका दिया है. डेमोक्रेटिक पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए रिपब्लिकन पार्टी को करारी शिकस्त दी है. चुनाव के नतीजे काफी हद तक पहले के अनुमानों के मुताबिक रहे, लेकिन डेमोक्रेट्स की जीत का अंतर उम्मीद से ज्यादा रहा.
अब इन नतीजों के बाद भारत और अमेरिका के रिश्तों को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है. दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों के बीच आगे किस तरह के संबंध रहेंगे, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं.
अमेरिकी चुनाव के नतीजों पर नजर
भारत सरकार भी अमेरिकी चुनाव के नतीजों और वहां बदलते राजनीतिक समीकरणों पर करीब से नजर रख रही है. पिछले कुछ समय से भारत और अमेरिका के बीच कई मुद्दों पर मतभेद सामने आए हैं. इनमें व्यापारिक टैरिफ, पाकिस्तान के साथ अमेरिकी संबंध, रूस से तेल खरीद और ट्रंप की मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (MAGA) नीति प्रमुख हैं.
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पाकिस्तान के समर्थन से भारत की बढ़ी चिंता
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई मौकों पर पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के प्रति सकारात्मक रुख दिखाया है. ट्रंप ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सीजफायर का श्रेय भी खुद लेने की कोशिश की थी. उन्होंने दावा किया था कि उनकी पहल से दोनों देशों के बीच युद्ध रुक गया और परमाणु टकराव की स्थिति टल गई.
हालांकि, भारत ने अमेरिकी राष्ट्रपति के इस दावे को स्वीकार नहीं किया. भारत का कहना था कि पाकिस्तान के सैन्य संचालन महानिदेशक (DGMO) ने 10 मई 2025 को दोपहर 3 बजकर 35 मिनट पर अपने भारतीय समकक्ष को फोन कर सीजफायर की मांग की थी.
भारत के अनुसार, सीजफायर की घोषणा से पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर ने विदेश सचिव विक्रम मिस्री को इसकी जानकारी सार्वजनिक करने के लिए कहा था. भारतीय सेना प्रमुख ने अपनी सैन्य टुकड़ियों को सूचना देने के लिए शाम 5 बजे तक का समय मांगा था. इसी बीच पाकिस्तान ने वाशिंगटन को सीजफायर समझौते की जानकारी दे दी और ट्रंप ने भारत की आधिकारिक घोषणा से पहले ही सोशल मीडिया पर इसका श्रेय लेना शुरू कर दिया.
रूस से तेल खरीद पर भी बढ़ा विवाद
भारत और अमेरिका के बीच तनाव की एक बड़ी वजह रूस से कच्चे तेल की खरीद भी रही है. ट्रंप प्रशासन ने रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर भारी टैरिफ लगाने की धमकी दी थी. वहीं, चुनाव से पहले अमेरिका ने खुद रूस से डीजल खरीदने का समझौता किया. इस दोहरे रुख को लेकर भारत में सवाल उठे.
इसके अलावा H-1B वीजा और भारतीय छात्रों के वीजा को लेकर अमेरिकी प्रशासन की सख्ती ने भी दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित किया है. ट्रंप ने एक समय भारत की अर्थव्यवस्था को डेड इकोनॉमी कहा था, हालांकि बाद में उन्होंने भारत की आर्थिक विकास दर की तारीफ भी की.
क्वाड शिखर सम्मेलन पर भी टिकी नजर
पाकिस्तान के साथ अमेरिका की बढ़ती नजदीकी भारत के लिए चिंता का विषय रही है. अमेरिका ने अफगानिस्तान से पाकिस्तान में होने वाले आतंकवाद के मुद्दे पर भी इस्लामाबाद के आरोपों का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था. वहीं, भारत को आशंका है कि पाकिस्तान की सेना को अमेरिकी सैन्य उपकरणों और हवाई प्लेटफॉर्म के आधुनिकीकरण में मदद मिल सकती है.
अमेरिका ने पाकिस्तान को आर्थिक संकट से उबारने में भी सहायता दी है. दूसरी ओर, भारत के साथ आतंकवाद के खिलाफ सहयोग की बात करता रहा है. भारत की मेजबानी में 2025 में होने वाला क्वाड शिखर सम्मेलन भी अब तक आयोजित नहीं हो सका है.
अब वाशिंगटन पर है रिश्ते सुधारने की जिम्मेदारी
भारत ने हमेशा रूस-यूक्रेन और ईरान से जुड़े संघर्षों को समाप्त करने की वकालत की है. नई दिल्ली का रुख स्पष्ट रहा है कि वह अपने नागरिकों के हितों को ध्यान में रखकर ही विदेश नीति से जुड़े फैसले लेगा. भारत ट्रंप की चुनावी हार या राजनीतिक झटके पर जश्न मनाने के बजाय द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहता है.
मिडटर्म चुनाव के नतीजों के बाद अमेरिका की घरेलू राजनीति में समीकरण बदल रहे हैं. ऐसे में भारत-अमेरिका संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की जिम्मेदारी अब काफी हद तक वाशिंगटन पर है. आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ट्रंप प्रशासन भारत के साथ व्यापार, रक्षा, आतंकवाद और रणनीतिक साझेदारी जैसे मुद्दों पर क्या रुख अपनाता है.