जंतर-मंतर लाठीचार्ज केस में नया मोड़! CJI सूर्यकांत को सुनवाई से हटाने की उठी मांग
जंतर-मंतर कथित लाठीचार्ज मामले में एक वकील ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत से सुनवाई से अलग होने का अनुरोध किया है. पत्र में निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करने के लिए मामले को दूसरी बेंच के पास भेजने की मांग की गई है.
नई दिल्ली: जंतर-मंतर पर कथित लाठीचार्ज से जुड़े मामले ने अब न्यायिक स्तर पर भी नया मोड़ ले लिया है. एक अधिवक्ता ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि वह इस मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग करें, ताकि निष्पक्षता को लेकर किसी तरह का सवाल न उठे.
वकील ने CJI को भेजा पत्र
अधिवक्ता शिव कुमार त्रिपाठी ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को पत्र भेजकर आग्रह किया है कि जंतर-मंतर पर कथित लाठीचार्ज से जुड़े मामले की सुनवाई किसी दूसरी बेंच को सौंपी जाए. उनके अनुसार यह मामला सार्वजनिक चर्चा का विषय बन चुका है और ऐसे में न्यायिक प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष दिखाई देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि निष्पक्ष होना. पत्र में कहा गया है कि इससे न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा और मजबूत होगा.
निष्पक्षता और संवैधानिक अधिकारों का हवाला
पत्र में कहा गया है कि प्रत्येक नागरिक को संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है. यदि किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग के आरोप लगते हैं, तो उसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है. अधिवक्ता ने कहा कि किसी भी कार्रवाई की वैधता का आकलन निष्पक्ष तरीके से होना चाहिए, जिससे न्याय प्रक्रिया पर कोई संदेह न रहे.
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पुराने मामले का भी किया उल्लेख
याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के चयन से जुड़े एक पुराने मामले का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें हितों के टकराव की आशंका को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश ने स्वयं को सुनवाई से अलग कर लिया था. अधिवक्ता का तर्क है कि उसी सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए इस मामले में भी रिक्यूजल पर विचार किया जाना चाहिए, ताकि किसी प्रकार की पक्षपात की आशंका न बने.
सार्वजनिक धारणा का भी जिक्र
पत्र में यह भी कहा गया है कि कुछ लोगों ने जंतर-मंतर के विरोध प्रदर्शन को न्यायिक कार्यवाही के दौरान की गई कथित टिप्पणियों से जोड़कर देखा है. हालांकि, अधिवक्ता ने स्पष्ट किया कि वह इन दावों की पुष्टि नहीं कर रहे हैं. उनका कहना है कि केवल सार्वजनिक धारणा को देखते हुए भी यह उचित होगा कि मामले की सुनवाई किसी अन्य बेंच को सौंपने पर विचार किया जाए, जिससे न्यायपालिका की निष्पक्ष छवि बनी रहे.