'पहले हमला, फिर खुद को पीड़ित बताना', चीन की रणनीति पर विजय गोखले का बड़ा खुलासा

पूर्व विदेश सचिव विजय गोखले ने चीन की सैन्य रणनीति और कूटनीति का विश्लेषण करते हुए कहा है कि बीजिंग अनुकूल परिस्थितियों का इंतजार करता है, फिर पहले कार्रवाई कर उसे आत्मरक्षा के रूप में पेश करता है.

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Kanhaiya Kumar Jha

नई दिल्ली: पूर्व विदेश सचिव विजय गोखले ने अपनी नई किताब China’s Wars: The Politics and Diplomacy Behind its Military Coercion में चीन की युद्ध नीति और दबाव बनाने की रणनीति पर विस्तार से चर्चा की है. उनके मुताबिक, चीन किसी संघर्ष में सीधे कूदने के बजाय पहले अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का आकलन करता है. जब उसे अपने लिए रणनीतिक फायदा दिखाई देता है, तब वह पहल करता है. भारत-चीन संबंधों को लेकर गोखले इसे ‘सशस्त्र सह-अस्तित्व’ का दौर मानते हैं.

गोखले के अनुसार, चीन को अवसरवादी शक्ति कहने का अर्थ यह नहीं है कि वह दूसरी बड़ी शक्तियों से पूरी तरह अलग है. उनका कहना है कि चीन ने कई मौकों पर तब संघर्ष का रास्ता चुना, जब अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां उसके पक्ष में थीं या किसी बड़ी शक्ति के साथ उसके संबंधों से उसे फायदा मिल रहा था. यानी बीजिंग परिस्थितियों को अपने रणनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करता है.

पश्चिम और चीन की ‘निवारक’ रणनीति में अंतर

गोखले बताते हैं कि पश्चिमी देशों में deterrence का मतलब आमतौर पर किसी विरोधी को जवाबी कार्रवाई के डर से आगे बढ़ने से रोकना है. चीन की सोच इससे अलग है. वहां preventive deterrence का मतलब विरोधी के कदम उठाने से पहले ही कार्रवाई करना हो सकता है. इसका मकसद सैन्य कार्रवाई के साथ ऐसा राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना है, जिससे दूसरा पक्ष पीछे हट जाए.


1962 के युद्ध का दिया उदाहरण

भारत-चीन युद्ध का 1962 का उदाहरण देते हुए गोखले ने कहा कि उस समय भारत की ओर से चीन पर सैन्य हमला करने की कोई स्पष्ट तैयारी नहीं दिख रही थी. इसके बावजूद चीन ने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बयानों और उस समय के अंतरराष्ट्रीय माहौल को अपने पक्ष में इस्तेमाल किया. उस दौर में क्यूबा मिसाइल संकट के कारण दुनिया का ध्यान महाशक्तियों के तनाव पर केंद्रित था. गोखले के अनुसार, चीन ने इसी परिस्थिति में भारत के खिलाफ पहले कार्रवाई की.

कार्रवाई के बाद कहानी बदलने की रणनीति

गोखले के मुताबिक, चीन की रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी है कि वह अपनी आक्रामक कार्रवाई को अक्सर रक्षात्मक कदम के रूप में प्रस्तुत करता है. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने सत्ता में आने के बाद देश की कठिन परिस्थितियों और कमजोर होती अर्थव्यवस्था के लिए बाहरी कारणों को जिम्मेदार ठहराने वाली राजनीतिक कहानी बनाई. इससे पार्टी ने खुद को चीन को संकट से निकालने वाली शक्ति के रूप में पेश किया.

भारत-चीन रिश्तों में ‘सशस्त्र सह-अस्तित्व’

गोखले का मानना है कि भारत और चीन के संबंध अब ऐसे दौर में हैं जिसे ‘सशस्त्र सह-अस्तित्व’ कहा जा सकता है. उनके अनुसार, पूर्ण युद्ध फिलहाल सबसे संभावित स्थिति नहीं है, लेकिन इसे पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता. चीन की रणनीति को समझने के लिए सैन्य गतिविधियों के साथ उसकी कूटनीति और राजनीतिक संदेशों पर भी नजर रखना जरूरी है. भविष्य में शी जिनपिंग के बाद की राजनीतिक अनिश्चितता वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर असर डाल सकती है.