नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का आयोजन हो रहा है. मेजबान देश होने के नाते भारत अपने सहयोगी देशों के सामने एक महत्वपूर्ण मांग रख रहा है. भारत चाहता है कि ब्रिक्स बाजार में उसके सामानों की पहुंच आसान हो ताकि तेजी से बढ़ते व्यापार घाटे को संतुलित किया जा सके.
वित्तीय वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, ब्रिक्स देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा बढ़कर 226.1 अरब डॉलर हो गया है. हालांकि कुल व्यापार लगभग 417.5 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, लेकिन आयात निर्यात के मुकाबले काफी तेज गति से बढ़ा है. इस आंकड़े में चीन (100 अरब डॉलर से अधिक) और रूस (55 अरब डॉलर) का सबसे बड़ा योगदान है.
विशेषज्ञों के अनुसार, यह घाटा केवल अस्वस्थ व्यापार का संकेत नहीं है, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला की स्थिति को दर्शाता है. रूस के साथ घाटे की मुख्य वजह रियायती दर पर कच्चा तेल खरीदना है, जिसने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया है. वहीं चीन से भारी मात्रा में मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक कच्चे माल का आयात किया जाता है, जो भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के लिए बेहद जरूरी हैं.
ब्रिक्स मंच भले ही बहुध्रुवीय व्यवस्था को बढ़ावा देता हो, लेकिन व्यापारिक दृष्टिकोण से चीन अब भी विनिर्माण के केंद्र में है. भारत को डर है कि स्थानीय मुद्रा में भुगतान और डिजिटल व्यापार गलियारे जैसी नई पहलें उसकी चीन पर निर्भरता को और बढ़ा सकती हैं. यही वजह है कि भारत अब आयात पर निर्भर रहने के बजाय विनिर्माण क्षमता मजबूत करना चाहता है.
भारत इस सम्मेलन के जरिए गैर-टैरिफ बाधाओं को हटाने, सीमा शुल्क प्रक्रियाओं को आसान बनाने और फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग सामान, ऑटोमोबाइल व डिजिटल सेवाओं के लिए बेहतर बाजार पहुंच की वकालत कर रहा है. इस सम्मेलन की सफलता इस बात से तय होगी कि भारत ब्रिक्स आपूर्ति श्रृंखला में केवल एक उपभोक्ता के बजाय उत्पादक के रूप में कैसे उभरता है.