Ayodhya Ke Ram: क्या सच में होता है सोने का हिरण, आज...अभी...इसी वक्त दूर कर लीजिए अपने सारे भ्रम
Ayodhya Ke Ram: मारीच के वेश बदलने की इसी कला के कारण आगे मृग मारीचिका जैसे मुहावरे का जन्म हुआ, जिसका मतलब है 'वो दिखना, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं'.
Ayodhya Ke Ram: अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की तैयारियों के बीच उनके जीवन प्रसंगों और उनसे जुड़े स्थानों की चर्चा भी खूब हो रही है. इन्हीं स्थानों में से एक है पंचवटी, जिसका नाम सोने के हिरण के साथ जुड़ता है. रामकथा में कहा गया है कि भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास के दौरान चलते-चलते एक जंगल में पहुंचे, जिसका नाम पंचवटी था. वहां माता सीता ने सोने का हिरण देखा था. पर सवाल खड़ा होता है कि क्या सचमुच सोने का हिरण होता है. तो चलिए यही जानने की कोशिश करते हैं.
सूर्पणखा की कहानी
रामकथा में कहा गया है कि लंका के राजा रावण की बहन शूर्पणखा पंचवटी वन में ही रहती थी. उसने अयोध्या को दोनों राजकुमारों को देखा तो उन पर मोहित हो गई. उसने पहले राम के सामने प्रेम विवाह का प्रस्ताव रखा. उनके मना करने पर लक्ष्मण के पास गई. उन्होंने भी मना किया तो अपने असली रूप में आ गई. यहीं पर लक्ष्मण ने सूर्पणखा की नाक काट दी और वो रोते हुए रावण के पास गई.
रावण ने लिया था मारीच का सहारा
बहन के अपमान का बदला लेने के लिए रावण ने राक्षस मारीच को बुलाया. मारीच सुंद और ताड़का का बेटा था और अगस्त्य मुनि के शाप से राक्षस बना था. महर्षि विश्वामित्र के आश्रम में यज्ञ में बाधा डालने वाला भी मारीच ही था, जिसे 15 साल की उम्र में ही राम ने सबक सिखाया था. यज्ञ की रक्षा के लिए महर्षि विश्वामित्र जब राम-लक्ष्मण को आश्रम ले गए थे तो श्रीराम ने मारीच को एक बाण मारा था, जिससे वो 100 योजन दूर जाकर गिरा और फिर कभी किसी को तंग नहीं कर पाया. मारीच रिश्ते में रावण का मामा था. मारीच को बुलाकर रावण ने षडयंत्र रचा, जिसके बाद मारीच सोने का मृग बनकर पंचवटी जा पहुंचा.
सोने के मृग की असली कहानी
माता सीता ने मारीच को देखा तो सचमुच में सोने का मृग समझ बैठीं. इसी मारीच की बदौलत रावण ने माता सीता का हरण किया था. वास्तव में वो मारीच का एक बहुरूप था और सोने का मृग नहीं होता है. मारीच के वेश बदलने की इसी कला के कारण आगे मृग मारीचिका जैसे मुहावरे का जन्म हुआ, जिसका मतलब है 'वो दिखना, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं'.
नासिक में हिंदुओं का प्रमुख तीर्थस्थल
जिस पंचवटी वन में ये सब हुआ था, आज भी उसका अस्तित्व है और यह महाराष्ट्र के नासिक में स्थित है. ये हिंदुओं का एक प्रमुख तीर्थस्थान बन चुका है. कहा जाता है कि सूर्पणखा की नासिका काटने के कारण ही इस इलाके का नाम नासिक पड़ा. मुंबई से नासिक करीब 200 किलोमीटर दूर है, जहां त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है. त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के पास ही पंचवटी बसा है. बताया जाता है कि पांच वृक्ष होने के कारण इस जगह का नाम पंचवटी पड़ा.
जटायु का तर्पण
इसी पंचवटी से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर वो जंगल भी है, जहां श्रीराम ने गिद्धराज जटायु की अंत्येष्टि की थी. रामकथा के अनुसार रावण के हमले में घायल जटायु ने श्रीराम की गोद में प्राण त्यागे थे. उनके तर्ण के लिए राम ने धरती में बाण मारकर यहीं से जल निकाला था. आज इसे सर्वतीर्थ कुंड के नाम से जाना जाता है. पंचवटी के पास ही ब्रह्मगिरि पर्वत है, जिससे गोदावरी नदी निकलती है.