'हमारा धर्म... हम तय करेंगे', असदुद्दीन ओवैसी ने हिजाब पर की कोर्ट के फैसले की आलोचना
असदुद्दीन ओवैसी ने हिजाब से जुड़े इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर आपत्ति जताई है. उन्होंने कहा कि धर्म में क्या जरूरी है, इसका फैसला अदालतों को नहीं करना चाहिए.
नई दिल्ली: AIMIM प्रमुख और हैदराबाद सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है, जिसमें स्कूल में मुस्लिम छात्रा को हिजाब पहनने की अनुमति देने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी गई. ओवैसी ने कोर्ट के फैसले को इस्लाम पर हमला बताया और कहा कि किसी धर्म में क्या जरूरी है, इसका फैसला न्यायाधीशों को नहीं करना चाहिए.
ओवैसी ने कहा, "यह हमारा धर्म है और हम तय करेंगे कि इसमें क्या जरूरी है. न्यायाधीश कौन होते हैं यह तय करने वाले. यह हमारे धर्म पर हमला है." उन्होंने कहा कि छात्रा ने सिर पर हिजाब पहना है, अपने दिमाग पर नहीं.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 21 अगस्त को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि किसी छात्र को निजी पसंद के आधार पर स्कूल द्वारा तय ड्रेस कोड में बदलाव करने का अधिकार नहीं है. कोर्ट ने प्रयागराज के एक निजी स्कूल की छात्रा की याचिका खारिज कर दी. छात्रा हाई स्कूल पास करने के बाद उसी स्कूल में कक्षा 11 में दाखिला लेना चाहती थी और निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ सिर पर हिजाब पहनने की अनुमति मांग रही थी.
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जस्टिस जे जे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की दो सदस्यीय पीठ ने हिजाब को इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा मानने के तर्क को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में यह मुद्दा सामने आया है, उनमें हाई कोर्ट का रुख यह रहा है कि महिलाओं के लिए हिजाब पहनना इस्लाम की ऐसी अनिवार्य प्रथा नहीं है, जिसके पालन के बिना धार्मिक आस्था प्रभावित हो.
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी स्कूल का ड्रेस कोड निष्पक्ष और गैर भेदभावपूर्ण है तथा उसका उद्देश्य अनुशासन और समानता बनाए रखना है, तो स्कूल को अपने ड्रेस कोड और आंतरिक अनुशासन को लागू करने की स्वतंत्रता है.
ओवैसी ने क्या कहा?
ओवैसी ने कहा कि यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 19 और 25 के खिलाफ है. उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट में आवश्यक धार्मिक प्रथाओं से जुड़ा मामला पहले से विचाराधीन है, इसलिए इलाहाबाद हाई कोर्ट को इस मुद्दे पर फैसला नहीं देना चाहिए था.
ओवैसी ने छात्रा की मांग का समर्थन करते हुए कहा कि यूनिफॉर्मिटी और समानता एक चीज नहीं हैं. उन्होंने दावा किया कि इस फैसले से मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा प्रभावित हो सकती है. उन्होंने उत्तर प्रदेश में मुस्लिम छात्राओं के माध्यमिक शिक्षा में नामांकन को लेकर भी चिंता जताई.