ऑपरेशन सिंदूर की रणनीति को लेकर पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने अहम जानकारी साझा की है. उन्होंने बताया कि इस बार भारतीय सशस्त्र बलों ने निचले हवाई क्षेत्र को चुना. उनका कहना है कि इस फैसले से कार्रवाई का दायरा सीमित रहा और अचानक हमला करने का फायदा मिला.
जनरल अनिल चौहान के मुताबिक, उरी और पुलवामा के बाद अपनाई गई रणनीतियों से ऑपरेशन सिंदूर का तरीका अलग था. इस बार निचले हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल करने का फैसला लिया गया. उनके अनुसार इससे कार्रवाई का स्तर सीमित रखने, लक्ष्य हासिल करने और दुश्मन को अचानक चौंकाने में मदद मिली. लोअर एयरस्पेस में ड्रोन, सटीक हथियार और कम ऊंचाई पर काम करने वाले सैन्य प्लेटफॉर्म जैसे साधनों का इस्तेमाल किया जा सकता है. इस रणनीति का एक बड़ा फायदा यह भी रहा कि बड़े स्तर पर संघर्ष बढ़ने का खतरा कम रखा जा सका. जनरल चौहान ने इसे सैन्य योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया.
पूर्व CDS ने ऑपरेशन सिंदूर में तीनों सेनाओं के बीच मजबूत तालमेल को भी अहम बताया. उनके अनुसार इस बार सेना, नौसेना और वायुसेना ने शुरुआत से एक साथ काम किया और अपनी आंतरिक कमियों को पहले ही सुलझाया. इससे राजनीतिक नेतृत्व के सामने एक तैयार और साझा योजना रखी जा सकी. जनरल चौहान के मुताबिक, पहले कई मौकों पर अलग-अलग सेवाओं की कमियां सामने आने से फैसलों में देरी हो सकती थी लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। उनके बयान से साफ है कि संयुक्त योजना और आपसी तालमेल को अभियान की सफलता के लिए जरूरी माना गया.
ऑपरेशन सिंदूर को लेकर जनरल चौहान ने बताया कि भारत ने पहले की कार्रवाइयों से अलग रास्ता चुना. उरी के बाद जमीनी कार्रवाई और पुलवामा के बाद बड़े हवाई अभियान का विकल्प अपनाया गया था. वहीं इस बार लोअर एयरस्पेस पर ध्यान दिया गया. इससे सैन्य कार्रवाई को सीमित रखने के साथ लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिली. उन्होंने यह भी बताया कि आधुनिक अभियानों में ड्रोन और सटीक हथियारों की भूमिका बढ़ रही है. तीनों सेनाओं का एक साथ काम करना भविष्य की सैन्य योजनाओं के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.