अमेरिका पर निशाना, इजराइल को नसीहत और ईरान का समर्थन; क्या भारत ने बदल लिया अपना रुख?
ब्रिक्स के 'नई दिल्ली घोषणापत्र' में अमेरिका के एकतरफा प्रतिबंधों, इजराइल के सैन्य कदमों की आलोचना और ईरान का समर्थन किया गया. इस आम सहमति को भारत की कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है.
नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के बाद जारी संयुक्त घोषणापत्र ने वैश्विक कूटनीति में हलचल मचा दी है. 11 सदस्य देशों वाले इस विस्तारित समूह में मध्य पूर्व (पश्चिम एशिया) युद्ध को लेकर ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच अलग-अलग मत थे. इसके बावजूद भारत ने अपनी अध्यक्षता में सभी सदस्य देशों को एक साझा घोषणापत्र पर सहमत करने में सफलता प्राप्त की. इसे भारत की एक बड़ी कूटनीतिक जीत माना जा रहा है, क्योंकि भारत ने ब्रिक्स को "गैर-पश्चिमी (Non-Western) तो रखा, लेकिन अमेरिका या पश्चिम-विरोधी (Anti-Western) बनने से बचा लिया."
अमेरिका का नाम लिए बिना प्रतिबंधों की कड़े शब्दों में निंदा
घोषणापत्र में संयुक्त राष्ट्र (UN) की मंजूरी के बिना लगाए जाने वाले "एकतरफा आर्थिक और द्वितीयक (secondary) प्रतिबंधों" की कड़ी आलोचना की गई है. हालांकि, इसमें सीधे तौर पर अमेरिका (US) का नाम नहीं लिया गया है, लेकिन यह जगजाहिर है कि वाशिंगटन ही ऐसे एकतरफा प्रतिबंधों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करता है, जिससे ब्रिक्स सदस्य रूस और ईरान बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. इसके अतिरिक्त, विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के उल्लंघन और एकतरफा टैरिफ (शुल्क) थोपने पर भी चिंता जताई गई, जो डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की व्यापार नीतियों पर अप्रत्यक्ष प्रहार माना जा रहा है.
परमाणु ठिकानों पर हमले पर चिंता और ईरान का समर्थन
घोषणापत्र में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की देखरेख वाले नागरिक बुनियादी ढांचों और शांतिपूर्ण परमाणु संयंत्रों पर होने वाले हमलों पर "गंभीर चिंता" व्यक्त की गई है. यद्यपि इसमें ईरान का नाम नहीं है, लेकिन मध्य पूर्व में जारी तनाव के संदर्भ में इसे अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरानी परमाणु ठिकानों को निशाना बनाए जाने के खिलाफ ईरान के रुख के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है. इसके साथ ही, ब्रिक्स ने ईरान की डब्ल्यूटीओ (WTO) सदस्यता का भी पुरजोर समर्थन किया है.
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गाजा और लेबनान में इजराइल के सैन्य कदमों की तीखी आलोचना
अमेरिका और ईरान के विपरीत, इजराइल को घोषणापत्र में सीधे तौर पर नाम लेकर घेरा गया है. ब्रिक्स नेताओं ने गाजा में जारी हिंसा, फिलिस्तीनियों के जबरन विस्थापन का विरोध किया और 1967 की सीमाओं के आधार पर स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश का समर्थन किया. वहीं लेबनान के मुद्दे पर घोषणापत्र में इजराइल से स्पष्ट शब्दों में कहा गया कि वह लेबनानी क्षेत्र में मौजूद अपनी सभी "ऑक्यूपाइंग फोर्सेज" (कब्जाधारी सेना) को तुरंत वापस बुलाए. पूरे घोषणापत्र में इजराइल ही एकमात्र ऐसा देश है जिसे अपनी सेना वापस बुलाने के लिए सीधे नाम से संबोधित किया गया है.
क्या बदला है भारत का विदेश नीति रुख?
इजराइल पर कड़े रुख और एकतरफा प्रतिबंधों की आलोचना के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या भारत ने अपनी संतुलन बनाने की नीति बदल दी है? विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का रुख बदला नहीं है, बल्कि यह ब्रिक्स की आम सहमति (consensus) का हिस्सा है. भारत हमेशा से दो-राष्ट्र समाधान (Two-State Solution) और कूटनीतिक बातचीत का समर्थक रहा है. अमेरिका का नाम शामिल न करवाकर भारत ने वाशिंगटन के साथ अपने रणनीतिक और बहु-स्तरीय संबंधों (Multi-aligned policy) के लिए गुंजाइश बनाए रखी है.
एक्सपर्ट्स की राय और ब्रिक्स में भारत का भविष्य
इस संयुक्त घोषणापत्र को लेकर विशेषज्ञों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आई हैं. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के प्रोफेसर राजेश राजागोपालन का मानना है कि भारत को ब्रिक्स को चीन की वैश्विक महत्वाकांक्षाओं का जरिया बनने से रोकना चाहिए. वहीं, कई अर्थशास्त्रियों का सुझाव है कि भारत का दीर्घकालिक हित पश्चिम (अमेरिका और यूरोप) के साथ व्यापारिक समझौते मजबूत करने में है. इसके बावजूद, 11 विविध राष्ट्रीय हितों वाले देशों के बीच सहमति बनाकर घोषणापत्र जारी करवाना भारत की गुटनिरपेक्ष और लचीली कूटनीति की क्षमता को दर्शाता है.