पेट का फूलना केवल पाचन से संबंधित नहीं होता है, यह माइक्रोबायोम से भी जुड़ा होता है जो हमारे मेटाबॉलिज्म से लेकर हमारे मेंटल हेल्थ को प्रभावित कर सकता है. अगर हमारे बॉडी में माइक्रोबायोम की कमी हो जाए तो यह न केवल पाचन संबंधी समस्या बल्कि कई बीमारियां हो सकती है.
आंतों में गुड बैक्टीरिया होते हैं, अगर यह कम हो जाए तो इसे डिस्बायोसिस कहा जाता है. ऐसी स्थिति इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज जैसी स्थितियों के लिए जिम्मेदार हो सकता है. IBD में गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट में लंबे समय तक सूजन बनी रहती है. यह कोई साधारण पाचन विकार नहीं होता बल्कि एक जटिल इम्यून-मध्यस्थता वाली बीमारी है. जो किसी भी इंसान को परेशान कर सकता है.
हर इंसान की आंत में अच्छे और बुरे बैक्टीरिया के बीच नाजुक संतुलन होता है, जो शरीर को सामान्य रूप से कार्य करने में मदद करता है. जब भी यह संतुलन बिगड़ जाता है तो पेट दर्द, दस्त, सूजन, थकान, पोषक तत्वों की कमी और बार-बार बीमार पड़ने जैसी समस्याएं सामने आने लगती हैं. यह समस्या केवल छोटी परेशानी खड़ी नहीं करता बल्कि गट-ब्रेन एक्सिस को प्रभावित करता है. IBD से पीड़ित अधिकांश मरीज तनाव, चिंता, उदासी और ब्रेन फॉग की शिकायत करते हैं.
IBD के पारंपरिक उपचार मुख्य रूप से लक्षणों को दबाने और सूजन कम करने पर केंद्रित रहते हैं. एंटीबायोटिक्स हानिकारक बैक्टीरिया तो मार देते हैं, लेकिन वे अच्छे बैक्टीरिया को भी नष्ट कर देते हैं, जिससे समस्या और गंभीर हो सकती है. इसी चुनौती को देखते हुए रीजेनरेटिव मेडिसिन के क्षेत्र में नए उपचार तेजी से विकसित हो रहे हैं. इनमें सबसे चर्चित है
फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांटेशन शामिल है. इसमें स्वस्थ डोनर के अच्छे बैक्टीरिया को मरीज की आंत में ट्रांसप्लांट किया जाता है. FMT अल्सरेटिव कोलाइटिस, इरिटेबल बाउल सिंड्रोम और लीकी गट जैसी स्थितियों में काफी प्रभावी पाया गया है. यह न सिर्फ सूजन कम करता है बल्कि आंत के स्वास्थ्य को बेहरतर बनाता है.
इसके अलावा हाइड्रोकोलोन थेरेपी को आंत की सफाई के लिए उपयोगी माना जा रहा है. इसमें फिल्टर किए गए पानी से आंतों के अपशिष्ट और हानिकारक सूक्ष्मजीवों को निकाला जाता है, जिससे नए उपचारों के लिए आंत तैयार होती है. प्रोबायोटिक्स, व्यक्तिगत पोषण योजना और स्टेम सेल जैसी पुनर्योजी तकनीकें भी अब समग्र उपचार का हिस्सा बन रही हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि IBD के प्रबंधन में अब बदलाव आ रहा है. लक्षण दबाने की बजाय आंत के माइक्रोबायोम को प्राकृतिक रूप से पुनर्स्थापित करने पर जोर दिया जा रहा है.