मुंबई: बॉलीवुड की जानी मानी सिंगर नेहा कक्कड़ आज किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं. उनकी आवाज पर करोड़ों लोग फिदा हैं और उनके गाने रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर छा जाते हैं. लेकिन आज जिस मुकाम पर नेहा हैं वहां तक का सफर आसान नहीं था. गरीबी, संघर्ष और कई बार मिली निराशाओं के बीच उन्होंने अपने सपनों को जिंदा रखा. मेहनत और लगन के बाद आखिरकार सफलता की ऊंचाइयों को छू लिया. 6 जून 1988 को उत्तराखंड के ऋषिकेश में जन्मी नेहा कक्कड़ आज अपना जन्मदिन मना रही हैं. इस खास मौके पर उनकी जिंदगी की वह कहानी जानना जरूरी है जो लाखों युवाओं को प्रेरणा देती है.
नेहा कक्कड़ का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम ऋषिकेश कक्कड़ और मां का नाम नीति कक्कड़ है. परिवार की आर्थिक स्थिति ज्यादा मजबूत नहीं थी. जब नेहा छोटी थीं तब उनका परिवार बेहतर भविष्य के लिए दिल्ली आकर बस गया. दिल्ली में भी परिवार को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा. ऐसी आर्थिक परिस्थिति के बीच दिल्ली में जीवन चलाना आसान नहीं था. लेकिन परिवार ने कभी भी हार नहीं मानी. इसी माहौल में नेहा ने संघर्ष का मतलब समझा और अपने सपनों को पूरा करने का संकल्प लिया.
नेहा कक्कड़ ने कई बार सार्वजनिक मंचों पर अपने बचपन के संघर्षों का जिक्र किया है. उन्होंने बताया था कि उनके पिता स्कूल के बाहर समोसे बेचकर परिवार का खर्च चलाते थे. परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए उनके माता पिता दिन रात मेहनत करते थे. नेहा ने एक रियलिटी शो में भावुक होकर कहा था कि जिस स्कूल में उनकी बहन सोनू कक्कड़ पढ़ती थीं उसी स्कूल के बाहर उनके पिता समोसे बेचा करते थे. उस दौर में परिवार को कई आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था लेकिन उन्होंने अपने बच्चों के सपनों को कभी टूटने नहीं दिया.
नेहा को बचपन से ही संगीत से गहरा लगाव था. 4 साल की उम्र में उन्होंने गाना शुरू कर दिया था. उनकी बड़ी बहन सोनू कक्कड़ पहले से ही संगीत से जुड़ी हुई थीं और नेहा भी उनके साथ धार्मिक आयोजनों में जाने लगीं. धीरे धीरे उन्होंने माता के जागरण और भजन कार्यक्रमों में गाना शुरू कर दिया. छोटी सी उम्र में मंच पर आत्मविश्वास के साथ गाना गाना उनके लिए एक बड़ी उपलब्धि थी. नेहा और उनकी बहन सोनू कक्कड़ अक्सर माता के जागरण में भजन गाया करती थीं. इन कार्यक्रमों में गाने के बदले उन्हें करीब 500 रुपये मिलते थे. उस समय यह रकम उनके परिवार के लिए काफी मायने रखती थी. नेहा ने कभी इस काम को छोटा नहीं समझा.