Main Wapas Aaunga Review: बंटवारे के दर्द और अधूरी मोहब्बत की कहानी है इम्तियाज अली की फिल्म मैं वापस आऊंगा, पढ़ें रिव्यू

इम्तियाज अली की फिल्म मैं वापस आऊंगा यादों, बिछड़न और प्रेम की एक कहानी है. नसीरुद्दीन शाह के दमदार अभिनय और ए आर रहमान के संगीत से सजी यह फिल्म दर्शकों को एक अलग अनुभव देती है.

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Babli Rautela

मुंबई: आज के दौर में जहां कई फिल्में बड़े सेट, भारी एक्शन और चमकदार सीन के सहारे दर्शकों को आकर्षित करने की कोशिश करती हैं, वहीं मैं वापस आऊंगा एक अलग रास्ता चुनती है. यह फिल्म शोर नहीं मचाती बल्कि धीरे धीरे आपके दिल में जगह बना लेती है. इम्तियाज अली की यह नई पेशकश इंसानी रिश्तों, बिछड़न और यादों की ताकत को बेहद खूबसूरती से पर्दे पर उतारती है. फिल्म की कहानी 95 साल के इशर सिंह ग्रेवाल के इर्द गिर्द घूमती है. उम्र के इस पड़ाव पर पहुंचकर भी उनके मन में एक अधूरा सपना जिंदा है. वह पाकिस्तान के सरगोधा जाना चाहते हैं. इसी दौरान उन्हें स्ट्रोक आ जाता है और उनकी याददाश्त कमजोर होने लगती है.

इशर कभी वर्तमान में रहते हैं तो कभी अतीत की गलियों में खो जाते हैं. उनके पोते निर्वैर को धीरे धीरे यह एहसास होता है कि उनके दादा के जीवन में कोई ऐसा अध्याय है जो आज भी अधूरा है. इसके बाद कहानी एक ऐसे सफर पर निकलती है जहां पुरानी यादें, खोया हुआ प्यार और बंटवारे की पीड़ा सामने आने लगती है.

बंटवारे के दर्द को करीब से दिखाती है फिल्म

भारत विभाजन को लेकर कई फिल्में बन चुकी हैं, लेकिन मैं वापस आऊंगा इस विषय को अलग नजरिए से पेश करती है. यह राजनीतिक घटनाओं पर नहीं बल्कि उन लोगों की भावनाओं पर फोकस करती है जिन्होंने बंटवारे का दर्द खुद महसूस किया था. फिल्म दिखाती है कि कैसे एक फैसला लाखों लोगों की जिंदगी बदल देता है. घर छूट जाते हैं, रिश्ते टूट जाते हैं और कई सपने हमेशा के लिए अधूरे रह जाते हैं. यही भावनात्मक पहलू फिल्म को खास बनाता है.


कैसा है इम्तियाज अली का डायरेक्शन

इम्तियाज अली हमेशा से रिश्तों और भावनाओं की कहानियां कहने के लिए जाने जाते हैं. इस फिल्म में भी उनकी यही खूबी साफ नजर आती है. वह दर्शकों को किरदारों के इतना करीब ले जाते हैं कि उनकी खुशी और दर्द दोनों महसूस होने लगते हैं. फिल्म का रनटाइम लंबा जरूर है, लेकिन कहानी अपने भावनात्मक जुड़ाव की वजह से दर्शकों को बांधे रखती है. कई दृश्य ऐसे हैं जो बिना ज्यादा संवादों के भी गहरा असर छोड़ते हैं.

नसीरुद्दीन शाह ने अभिनय से रचा जादू

अगर इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत की बात की जाए तो वह नसीरुद्दीन शाह हैं. उन्होंने इशर सिंह के किरदार को सिर्फ निभाया नहीं बल्कि उसे जी लिया है. कमजोर होती याददाश्त, खोए हुए प्यार की कसक और जीवन के अंतिम दिनों की बेचैनी को उन्होंने बेहद स्वाभाविक तरीके से दिखाया है. कई दृश्य ऐसे हैं जहां सिर्फ उनके चेहरे के भाव ही कहानी कह देते हैं. यह हाल के वर्षों की उनकी सबसे यादगार परफॉर्मेंस में से एक कही जा सकती है.

शरवरी और वेदांग रैना ने छोड़ी मजबूत छाप

शरवरी फिल्म में जिया के किरदार में नजर आती हैं और अपने अभिनय से प्रभावित करती हैं. वह किरदार की मासूमियत और भावनात्मक गहराई दोनों को संतुलित तरीके से निभाती हैं. वहीं वेदांग रैना भी लगातार बेहतर होते दिखाई देते हैं. उनकी स्क्रीन प्रेजेंस और अभिनय कहानी को मजबूती देते हैं. दोनों कलाकारों की जोड़ी फिल्म के रोमांटिक हिस्से को प्रभावी बनाती है.

दिलजीत दोसांझ ने निर्वैर के किरदार को ईमानदारी से निभाया है, लेकिन कहानी में उनका ट्रैक उतना प्रभावशाली नहीं लगता जितनी उम्मीद थी. फिल्म के अन्य मजबूत किरदारों और भावनात्मक घटनाओं के बीच उनका हिस्सा थोड़ा कमजोर पड़ जाता है. हालांकि कहानी को आगे बढ़ाने में उनका योगदान महत्वपूर्ण बना रहता है.