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Happy Birthday Gulzar: संपूर्ण सिंह कालरा कैसे बन गए थे गुलजार? परिवार के इस फैसले के खिलाफ उठाया था कदम

संपूर्ण सिंह कालरा का जन्म 18 अगस्त 1934 को पंजाब के दीना में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है. छोटी उम्र में ही मां का साया छूट गया. देश के बंटवारे ने परिवार को उजाड़ दिया. वे पहले अमृतसर और फिर दिल्ली पहुंचे. जब वहां गुजारा मुश्किल हो गया तो युवा संपूर्ण को मुंबई भेज दिया गया.

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Edited By: Antima Pal
Happy Birthday Gulzar: संपूर्ण सिंह कालरा कैसे बन गए थे गुलजार? परिवार के इस फैसले के खिलाफ उठाया था कदम
Courtesy: Pinterest

Happy Birthday Gulzar: आज 18 अगस्त 2026 को मशहूर शायर, गीतकार और निर्देशक गुलजार अपनी जिंदगी के 92वें साल में प्रवेश कर रहे हैं. करोड़ों लोगों के दिलों में बसे इन अल्फाजों के रचयिता का असली नाम संपूर्ण सिंह कालरा है. लेकिन परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर उन्होंने अपना नाम बदल लिया और गुलजार बन गए.

परिवार के खिलाफ जाकर बदला था नाम

संपूर्ण सिंह कालरा का जन्म 18 अगस्त 1934 को पंजाब के दीना में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है. छोटी उम्र में ही मां का साया छूट गया. देश के बंटवारे ने परिवार को उजाड़ दिया. वे पहले अमृतसर और फिर दिल्ली पहुंचे. जब वहां गुजारा मुश्किल हो गया तो युवा संपूर्ण को मुंबई भेज दिया गया.

'शायरी से पेट नहीं भरता...'

बचपन से ही उन्हें लिखने और तुकबंदी का शौक था. लेकिन उनके पिता माखन सिंह कालरा और भाई इस शौक को बिल्कुल पसंद नहीं करते थे. पिता अक्सर कहते थे कि शायरी से पेट नहीं भरता. लिखना छोड़ो, नहीं तो भूखे मरोगे. परिवार की इस नाराजगी से बचने के लिए संपूर्ण ने एक चालाकी भरा फैसला लिया.

संपूर्ण सिंह कालरा चुपके-चुपके गुलजार बने

मुंबई के वर्ली इलाके में उन्होंने एक मोटर गैरेज में मैकेनिक की नौकरी शुरू की. दिनभर गाड़ियों पर पेंट और ग्रीस के साथ काम करते, लेकिन दिमाग में शेर-शायरी घूमती रहती. परिवार को पता न चले, इसलिए उन्होंने लिखने के लिए नया नाम चुन लिया- गुलजार. बाद में इसमें 'दीनवी' भी जोड़ दिया, यानी दीना का रहने वाला. इस तरह संपूर्ण सिंह कालरा चुपके-चुपके गुलजार बन गए.

गैरेज की नौकरी के दौरान वे प्रगतिशील लेखक संघ की बैठकों में जाने लगे. वहां शैलेंद्र और अली सरदार जाफरी जैसे नामी लोगों से मुलाकात हुई. फिल्म 'बंदिनी' के दौरान शैलेंद्र ने उन्हें निर्देशक विमल रॉय से मिलवाया. गुलजार ने अपना पहला गाना सुनाया- 'मोरा गोरा अंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे' सब हैरान रह गए. यही गाना उनके करियर का दरवाजा खोल गया.

इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. 'आंधी', 'मौसम', 'इजाजत' और 'माचिस' जैसी फिल्मों का निर्देशन किया. 'तुझसे नाराज नहीं जिंदगी', 'तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं' और ऑस्कर विजेता 'जय हो' जैसे अमर गाने लिखे. परिवार ने जिस कलम को रोकने की कोशिश की थी, उसी ने आज गुलजार साहब का नाम इतिहास में अमर कर दिया. 92 साल की उम्र में भी उनकी मुस्कान और ठहरी आवाज लोगों के दिल छूती है.