नई दिल्ली: नया साल 2026 अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से शुरू हो चुका है, लेकिन जिस तारीख प्रणाली पर दुनिया का बड़ा हिस्सा चलता है, उसकी जड़ें वैज्ञानिक सटीकता से ज्यादा धार्मिक और राजनीतिक फैसलों में छिपी हैं. 1582 में जब पोप ग्रेगरी XIII ने इस कैलेंडर को लागू किया, तो एक झटके में 10 दिन आगे कर दिए गए, जिससे समय की गणना पर सवाल उठे और कई देशों में विरोध की आग भी भड़की.
इससे पहले यूरोप में जूलियन कैलेंडर प्रचलन में था, जिसमें हर साल लगभग 11 मिनट का अंतर रहता था. यही छोटी-सी भूल सदियों में बड़ी गड़बड़ी बन गई. वहीं भारत में उस दौर में विक्रम संवत, शक संवत और सूर्य–चंद्र चक्र आधारित पंचांग से काल गणना की जाती थी, जिसे आज भी धार्मिक तिथियों के निर्धारण में अधिक भरोसेमंद माना जाता है.
4 अक्टूबर 1582 की रात के बाद, यूरोप में अगली सुबह 15 अक्टूबर 1582 की तारीख आई. 5 से 14 अक्टूबर का अस्तित्व ही रिकॉर्ड से हट गया. मजदूरों ने इन ‘गायब’ दिनों की सैलरी मांगी. खगोलविदों ने अपने शोध-रिकॉर्ड पर असर की बात कही. इंग्लैंड, रूस और ग्रीस ने इस बदलाव को लंबे समय बाद स्वीकार किया. यह घटना कैलेंडर इतिहास की सबसे बड़ी समय-सुधार गड़बड़ियों में दर्ज है.
जूलियन कैलेंडर में वर्ष 365.25 दिन माना गया, जबकि वास्तविक ट्रॉपिकल वर्ष 365.2422 दिन का होता है. यही 11 मिनट हर 400 साल में 3 दिन पीछे ले जाते रहे. नतीजा यह हुआ कि वसंत विषुव, जो ईस्टर तय करने के लिए अहम था, 21 मार्च से खिसककर 11 मार्च तक आ गया. यूरोप में त्योहार और कृषि चक्र असंतुलित होने लगे, जिससे कैलेंडर सुधार जरूरी बना.
ग्रेगोरियन कैलेंडर को सुधार के रूप में पेश किया गया, लेकिन यह भी पृथ्वी की अंडाकार कक्षा और घूर्णन में होने वाले सूक्ष्म बदलावों से पूरी तरह तालमेल नहीं रखता. हर साल करीब 26 सेकेंड का अंतर बनता है. आलोचकों का मानना है कि अगर इसमें निरंतर खगोलीय समायोजन नहीं हुआ, तो हजारों साल बाद त्योहार मौसम से बेमेल हो सकते हैं.
1751 तक यूरोप और ब्रिटेन में नया साल मार्च से शुरू माना जाता था. 1750 में ब्रिटिश संसद के बिल के बाद इसे जनवरी में कर दिया गया. भारत में भी ब्रिटिश शासन के दौरान प्रशासनिक कामों के लिए इसी कैलेंडर का उपयोग शुरू हुआ, जबकि धार्मिक तिथियाँ आज भी पंचांग आधारित गणना से तय होती हैं.
भारतीय कैलेंडर प्रणाली में सूर्य–चंद्र चक्र और खगोलीय स्थिति के आधार पर तिथियाँ तय होती हैं, जिन्हें विद्वानों और खगोल गणना विशेषज्ञों द्वारा समय–समय पर समायोजित किया जाता है. यही कारण है कि भारत में पारंपरिक तिथि निर्धारण को अधिक तार्किक और संतुलित माना जाता है, खासकर धार्मिक और मौसमी गणना में.