नई दिल्ली: केंद्रीय बजट का समय नजदीक आते ही देश के करदाताओं की नजरें वित्त मंत्री पर टिक जाती हैं. हर साल की तरह इस बार भी अपेक्षाओं की सूची लंबी है. सरकार कर प्रणाली को सरल और पारदर्शी बनाने की बात लगातार करती रही है. ऐसे में करदाताओं को उम्मीद है कि बजट में ऐसे कदम उठाए जाएंगे, जो न सिर्फ अनुपालन को आसान बनाएं, बल्कि मौजूदा जटिलताओं को भी कम करें. नई आयकर व्यवस्था और बदलते आर्थिक हालात इस चर्चा को और महत्वपूर्ण बनाते हैं.
फिलहाल देश में अलग-अलग करदाताओं के लिए सात तरह के आयकर रिटर्न फॉर्म हैं. आय के स्रोत बदलने के साथ फॉर्म भी बदल जाता है, जिससे भ्रम और गलतियों की आशंका बढ़ जाती है. कर विशेषज्ञों का मानना है कि एक साझा आयकर रिटर्न फॉर्म लागू किया जाना चाहिए. इसमें करदाता अपनी कैटेगिरी और इनकम के सोर्स चुनें, जिसके बाद केवल वही जानकारी सामने आए जो उनके लिए जरूरी हों. इससे रिटर्न जमा करने की प्रक्रिया कहीं ज्यादा सरल हो सकती है.
नया आयकर कानून 1 अप्रैल 2026 से लागू होने वाला है. मौजूदा कानून के तहत पिछले छह दशकों में सैकड़ों सर्कुलर और नोटिफिकेशन जारी हुए हैं. विशेषज्ञों की राय है कि एक मास्टर सर्कुलर जारी किया जाना चाहिए, जिसमें केवल वही निर्देश शामिल हों जो नए कानून के तहत प्रासंगिक हों. इससे करदाताओं और पेशेवरों को सही नियमों का संदर्भ ढूंढने में आसानी होगी और अनावश्यक भ्रम भी कम होगा.
टैक्स डिडक्शन एट सोर्स यानी टीडीएस अनुपालन करदाताओं के लिए सबसे समय लेने वाली प्रक्रिया मानी जाती है. कई धाराओं में कलेक्शन न के बराबर है, फिर भी अनुपालन बोझ बना रहता है. सुझाव है कि ऐसी धाराओं को या तो खत्म किया जाए या आपस में जोड़ा जाए. साथ ही सीमित टीडीएस दरें तय हों, ताकि पालन आसान हो. टीडीएस सर्टिफिकेट की अनिवार्यता हटाकर फॉर्म 26AS और AIS को ही अंतिम आधार माना जा सकता है.
देश के कई शहर लगातार दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में गिने जाते हैं. इसे देखते हुए प्रत्यक्ष कर कानून को एक प्रोत्साहन उपकरण के रूप में इस्तेमाल करने का सुझाव दिया जा रहा है. इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद पर नए कर ढांचे में विशेष छूट दी जा सकती है. इसके अलावा कंपनियों को अपने सीएसआर खर्च का एक हिस्सा प्रदूषण नियंत्रण और शोध में लगाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है, जिसे कर कटौती योग्य माना जाए.
सरकार की नीति कम कर दरों और कम छूट की रही है, लेकिन मौजूदा स्वास्थ्य और पर्यावरण संकट को देखते हुए कुछ अपवादों की जरूरत महसूस की जा रही है. करदाताओं को उम्मीद है कि सरकार उनके व्यावहारिक अनुभवों को ध्यान में रखेगी. यदि बजट में इन सुझावों को जगह मिलती है, तो कर प्रणाली न सिर्फ सरल होगी, बल्कि सामाजिक चुनौतियों से निपटने में भी सहायक साबित हो सकती है.