84 देशों के जहाज आते थे जिस शहर में, मुंबई ने छीना बंदरगाह तो ऐसे बना हीरे-कपड़े का बादशाह ये शहर

सूरत की पहचान आज टेक्सटाइल और डायमंड सिटी के रूप में है, लेकिन कभी यही शहर समुद्री व्यापार का केंद्र था.

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Reepu Kumari

सूरत: तापी नदी के किनारे बसा सूरत आज कपड़े और हीरों के कारोबार में बड़ा नाम है, लेकिन इसकी कहानी सिर्फ उद्योगों तक सीमित नहीं है. करीब 500 साल के सफर में इस शहर ने समुद्री व्यापार, जहाज निर्माण और विदेशी कारोबार का दौर देखा. कभी यहां 84 से ज्यादा देशों के जहाज पहुंचते थे और विदेशी व्यापारी अपनी कोठियां बनाते थे. बाद में मुंबई बंदरगाह के उभरने से पुराना कारोबार कमजोर पड़ा, तो सूरत ने अपनी पहचान ही बदल ली. 

इतिहास

16वीं, 17वीं और 18वीं शताब्दी में अरब सागर से नजदीकी और तापी नदी ने सूरत को व्यापार के लिए खास बना दिया था. शहर का बंदरगाह विदेशी कारोबारियों से गुलजार रहता था. ब्रिटिश, डच और पुर्तगाली व्यापारी यहां अपने व्यापारिक केंद्र स्थापित कर चुके थे. मुगल दौर में इसकी कारोबारी ताकत और बढ़ी और यह पश्चिमी भारत का प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह बना. मक्का जाने वाले यात्रियों के लिए भी सूरत महत्वपूर्ण पड़ाव बना. इससे उसकी अहमियत बढ़ी.

पुराने नाम से अंग्रेजी शासन तक का सफर

सूरत के इतिहास की जड़ें बहुत पुरानी मानी जाती हैं और शहर का अतीत 300 ईसा पूर्व तक जाता है. 1500-1520 ईस्वी के दौरान यहां सूर्यपुर नामक पुराने हिंदू शहर का उल्लेख मिलता है. बाद में तापी नदी के किनारे सौवीर के राजा या ब्रिगस लोगों ने अपनी बस्ती बसाई. 1759 में ब्रिटिश शासकों ने मुगलों से सूरत का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया. 20वीं सदी की शुरुआत तक यहां ब्रिटिश शासन रहा.


जहाज बनते थे, विदेशी बाजारों से जुड़ा था शहर

सूरत की समृद्धि केवल जहाजों के आने-जाने से नहीं थी. तापी के किनारे अथवालाइंस से डुमस तक का इलाका जहाज निर्माण के लिए भी जाना जाता था. 1612 में अंग्रेजों ने यहां व्यापारिक केंद्र बनाया और 1614 में ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापार के अधिकार मिले. इससे सूरत भारत और विदेशी बाजारों के बीच अहम कारोबारी गेटवे बन गया. समुद्री व्यापार के साथ जहाज निर्माण ने भी शहर की आर्थिक ताकत बढ़ाई और व्यापार का दायरा भी मजबूत किया.

मुंबई के उभार ने बदल दिया पूरा खेल

लेकिन समय के साथ सूरत के पुराने कारोबारी ढांचे को एक बड़ा झटका लगा. मुंबई के बंदरगाह के उभरने के बाद सूरत की पोर्ट इकोनॉमी कमजोर पड़ने लगी. जहाज निर्माण का कारोबार भी धीरे-धीरे घटा और कई कारोबारी मुंबई की ओर चले गए. जिस शहर की समृद्धि समुद्री रास्तों पर टिकी थी, उसके सामने नए कारोबार की तलाश बेहद जरूरी हो गई. 

टेक्सटाइल और डायमंड ने दिलाई नई पहचान

सूरत को टेक्सटाइल और डायमंड सिटी के नाम से जाना जाता है. आजादी के बाद यहां टेक्सटाइल और ट्रेडिंग का विस्तार हुआ. साड़ी, ड्रेस मटेरियल, पॉलिएस्टर, सिल्क, प्रिंटेड और एम्ब्रॉयडर्ड फैब्रिक का कारोबार यहां होता है. दूसरी ओर डायमंड कटिंग और पॉलिशिंग ने शहर को वैश्विक पहचान दी. सरकारी वेबसाइट सूरत को दुनिया का सबसे बड़ा डायमंड मैन्युफैक्चरिंग सेंटर बताती है. यहां 5,000 से ज्यादा इकाइयां हैं.