भारतीय रुपये में 18 मार्च को बड़ी गिरावट दर्ज की गई और यह पहली बार 92.62 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच गया. पिछले कुछ समय से जारी कमजोरी के बीच यह अब तक का सबसे निचला स्तर है. इस गिरावट के पीछे मुख्य वजह मध्य पूर्व में जारी तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल माना जा रहा है. इसके अलावा विदेशी निवेशकों की सतर्कता और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है.
मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष ने वैश्विक बाजारों को झकझोर दिया है. इस स्थिति के कारण कच्चे तेल की कीमतों में करीब 40 प्रतिशत तक वृद्धि देखी गई है. भारत जैसे तेल आयात करने वाले देश के लिए यह बड़ी चुनौती है, क्योंकि इससे आयात बिल बढ़ता है और मुद्रा पर सीधा दबाव पड़ता है.
संघर्ष शुरू होने के बाद रुपये में 1.5 प्रतिशत से ज्यादा गिरावट आई है. वहीं, इसी अवधि में चीन की मुद्रा युआन में मामूली गिरावट और सिंगापुर डॉलर में सीमित कमजोरी देखी गई. इससे साफ है कि रुपये पर दबाव अन्य एशियाई मुद्राओं की तुलना में अधिक है.
बाजार में अनिश्चितता के चलते विदेशी निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया है. इसके साथ ही आयातकों और कारोबारियों की ओर से डॉलर की मांग बढ़ गई है. अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दर फैसले को लेकर भी बाजार में बेचैनी बनी हुई है, जिसका असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर पड़ रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक तनाव जारी रहता है और तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो रुपये पर दबाव बना रह सकता है. फिलहाल रुपये के 91.95 से 92.65 के बीच रहने की संभावना जताई जा रही है, लेकिन हालात में बदलाव ही इसकी दिशा तय करेंगे.