नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक मोर्चे पर चल रही लंबी खींचतान के बीच एक बड़ी और सुखद खबर सामने आई है. अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन द्वारा भारतीय निर्यात पर लगाए गए भारी 'रेसिप्रोकल टैरिफ' (पारस्परिक शुल्क) को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द करने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. इस फैसले से भारतीय निर्यातकों को करोड़ों डॉलर की राहत मिलने की उम्मीद है, लेकिन व्यापार का एक बड़ा हिस्सा अब भी 'राष्ट्रीय सुरक्षा' के कड़े प्रावधानों के जाल में फंसा हुआ है.
अदालत के इस फैसले के बाद, भारतीय वस्तुओं पर लगने वाला अतिरिक्त बोझ प्रभावी रूप से समाप्त हो गया है. पहले जहां भारतीय उत्पादों पर 18 प्रतिशत तक का भारी-भरकम 'पारस्परिक शुल्क' वसूला जा रहा था, वह अब वापस 'मोस्ट फेवर्ड नेशन' (MFN) स्तर पर आ जाएगा. ऐतिहासिक रूप से यह शुल्क दर औसत रूप से करीब 3 प्रतिशत के आसपास रही है. यह कमी भारतीय कपड़ा, कृषि और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के लिए अमेरिकी बाजार में अपनी पैठ दोबारा मजबूत करने का एक सुनहरा अवसर है.
भले ही सुप्रीम कोर्ट ने आपातकालीन टैरिफ को हटा दिया हो, लेकिन 'सेक्शन 232' के तहत लगाए गए शुल्क अब भी पूरी शक्ति के साथ लागू रहेंगे. अमेरिकी कानून के इस खंड के तहत स्टील, एल्युमीनियम, ऑटोमोबाइल, लकड़ी (timber), तांबा और मशीनरी जैसे उत्पादों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना गया है. आंकड़ों के अनुसार, 2024 में भारत ने इन श्रेणियों में अमेरिका को लगभग 8.3 अरब डॉलर का निर्यात किया, जो कुल निर्यात का लगभग 10.4 प्रतिशत है. यानी भारत का हर दसवां डॉलर अब भी टैरिफ जोखिमों के साये में है.
टैरिफ की मार झेलने वाले उत्पादों में सबसे बड़ा हिस्सा ऑटोमोबाइल (3.9 अरब डॉलर), स्टील (2.5 अरब डॉलर) और एल्युमीनियम (800 मिलियन डॉलर) का है. ये तीन क्षेत्र मिलकर उन वस्तुओं का 85 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं जिन पर अब भी उच्च शुल्क लागू रहेगा. भारत की इन क्षेत्रों में अमेरिका पर निर्भरता भी काफी अधिक है, जहां कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी 18.3 प्रतिशत है, वहीं इन विशिष्ट 'सेक्शन 232' श्रेणियों में यह बढ़कर 22.7 प्रतिशत हो जाती है.
व्यापार विश्लेषकों का मानना है कि यह राहत अधिक समय तक नहीं टिक सकती. अमेरिकी प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि वह व्यापारिक प्रतिबंध लगाने के लिए वैकल्पिक कानूनी रास्ते तलाश सकता है. ऐसे में निर्यातकों के लिए अनिश्चितता का माहौल फिलहाल पूरी तरह समाप्त होता नहीं दिख रहा है.