नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति को लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की एक नई रिसर्च चर्चा में है. रिपोर्ट के अनुसार, ऊंचे आयात शुल्क लगाने का अपेक्षित परिणाम नहीं मिला. इसके उलट अमेरिकी बाजार में आयात की गुणवत्ता प्रभावित हुई और व्यापारिक पैटर्न में बड़ा बदलाव देखने को मिला.
आईएमएफ के अर्थशास्त्रियों ने 2025 में लागू अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव का अध्ययन करते हुए एक विस्तृत शोध पत्र जारी किया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि ऊंचे टैरिफ लगाने के बावजूद विदेशी निर्यातकों ने अपने उत्पादों की कीमतों में कोई बड़ी कटौती नहीं की. अधिकांश मामलों में अतिरिक्त शुल्क का बोझ अमेरिकी आयातकों पर ही पड़ा. शोध के अनुसार, टैरिफ नीति का उद्देश्य आयात को सस्ता बनाना था, लेकिन वास्तविकता इससे अलग रही और अपेक्षित लाभ हासिल नहीं हो सका.
रिपोर्ट में बताया गया है कि जब विदेशी कंपनियों ने कीमतें कम नहीं कीं, तो अमेरिकी आयातकों ने कम लागत वाले विकल्प तलाशने शुरू किए. इसका परिणाम यह हुआ कि पहले की तुलना में कम गुणवत्ता वाले उत्पादों का आयात बढ़ गया. शोधकर्ताओं का मानना है कि इससे अमेरिकी कंपनियों की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है. साथ ही उपभोक्ताओं को भी गुणवत्ता में कमी का सामना करना पड़ सकता है, भले ही औसत आयात मूल्य कम दिखाई दे.
आईएमएफ के शोध में यह भी उल्लेख किया गया है कि यह स्थिति 2018-19 के अमेरिका-चीन व्यापार विवाद के दौरान देखे गए रुझान से काफी मिलती-जुलती है. उस समय भी ऊंचे टैरिफ के बावजूद विदेशी निर्यातकों ने बड़े स्तर पर कीमतें नहीं घटाईं थीं. इसके बजाय अमेरिकी कंपनियों ने दूसरे और अपेक्षाकृत सस्ते आपूर्तिकर्ताओं की ओर रुख किया था. मौजूदा अध्ययन में भी आयात संरचना में इसी तरह का बदलाव देखने को मिला.
आईएमएफ के अर्थशास्त्रियों जेबीन आन, लोरेंजो रोटुनो और मिशेल रूटा द्वारा तैयार इस शोध पत्र का निष्कर्ष है कि ट्रंप की टैरिफ नीति विदेशी निर्यातकों से बड़ी कीमत कटौती कराने में सफल नहीं रही. इसके बजाय अमेरिका के आयात स्रोत और उत्पादों का स्वरूप बदल गया. रिपोर्ट के अनुसार, औसत आयात कीमतों में जो कमी दिखाई दी, वह उत्पाद सस्ते होने के कारण नहीं, बल्कि कम कीमत और कम गुणवत्ता वाले विकल्पों की ओर झुकाव बढ़ने की वजह से आई.