भारत की अर्थव्यवस्था को बाहरी मोर्चे पर बड़ी राहत मिली है. भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, 21 अगस्त को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 12.42 अरब डॉलर बढ़कर रिकॉर्ड 729.33 अरब डॉलर पहुंच गया. इसके साथ ही फरवरी में दर्ज 728.5 अरब डॉलर का पिछला रिकॉर्ड भी टूट गया.
इस बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह विदेशों से आया भारी डॉलर प्रवाह है. जून की शुरुआत में RBI ने पूंजी आकर्षित करने के लिए कई कदम उठाए थे, जिनमें प्रवासी भारतीयों के लिए विशेष जमा योजना भी शामिल थी. इन उपायों के जरिए 21 अगस्त तक करीब 72.8 अरब डॉलर का प्रवाह देश में आया, जिसने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई.
डॉलर की इस आमद ने भारत के बाहरी खाते को भी सहारा दिया है. खास तौर पर इससे देश को व्यापक स्तर पर धन के आने-जाने के संतुलन में लगातार तीसरे साल घाटे की संभावित स्थिति से बचने में मदद मिली है. ऐसे समय में बढ़ता रिजर्व भारत की वित्तीय मजबूती के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ने का सीधा फायदा रुपये को भी मिल सकता है. RBI के पास अब जरूरत पड़ने पर बाजार में डॉलर बेचकर रुपये पर दबाव कम करने की अधिक क्षमता है. हालांकि, मई में रिकॉर्ड निचले स्तर से करीब 1.7 प्रतिशत संभलने के बावजूद रुपया अभी भी एशिया की कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में बना हुआ है. महंगा कच्चा तेल और भारत की आयात पर निर्भरता इसकी मुश्किल बढ़ा रही है.
हालांकि डॉलर जुटाने की यह रणनीति पूरी तरह मुफ्त नहीं है. प्रवासी जमा योजना के तहत बैंकों की हेजिंग लागत RBI वहन कर रहा है, जिससे विदेशों में रहने वाले भारतीयों को आकर्षक ब्याज दरें देने में मदद मिल रही है. मौजूदा अमेरिकी ब्याज दरें 2013 की तुलना में काफी ऊंची हैं, इसलिए इस बार रिजर्व जुटाने की लागत भी अधिक है.
Systematix Shares and Stocks के शोध प्रमुख धनंजय सिन्हा के मुताबिक, महंगे कर्ज के जरिए रिजर्व बढ़ाना रुपये को स्थिर रखने का सीमित और महंगा तरीका है. उनके अनुमान के अनुसार, इसकी सालाना लागत करीब 5.7 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है. यही वजह है कि RBI ने उम्मीद से बेहतर प्रवाह आने के बाद इस महीने प्रवासी जमा योजना को तय समय से पहले बंद करने का फैसला किया.