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स्वयं लंकापति रावण ने की थी इस शक्तिपीठ की स्थापना, शक्ति के साथ शिव भी हैं यहां विराजमान

Famous Temples: देवी माता के कुल 52 शक्तिपीठों को प्रमुख माना जाता है. इनमें से एक ऐसा भी शक्तिपीठ है, जिसकी स्थापना स्वयं लंकापति रावण ने की थी. इस जगह पर भगवान शिव स्वयं शक्ति के साथ विराजमान है. 

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Famous Temples: देवी भागवत पुराण में 108 और कालिकापुराण में 26 शक्ति पीठ बताए गए हैं. इसके साथ ही शिवचरित्र में 51 और दुर्गा सप्तशती और तंत्रचूड़ामणि में 52 शक्तिपीठों का वर्णन किया गया है. मान्यता है कि जिन जगहों पर माता सती के शरीर के अंग या आभूषण गिरे थे, उन सभी जगहों पर देवी के शक्तिपीठ बन गए हैं. इनमें से एक ऐसा शक्तिपीठ भी है, जिसका निर्माण स्वयं लंका के राजा रावण ने कराया था. 

इस शक्तिपीठ को इंद्राक्षी शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है. यह स्थान श्रीलंका में स्थित है. यहां शंकरी देवी मंदिर है. यह स्थान हिंदुओं के लिए आस्था का केंद्र है. यहां पर तमिलभाषी लोग अधिक आते हैं. यह मंदिर श्रीलंका की राजधानी कोलंबो से 250 किमी दूर त्रिकोणमाला नाम की पहाड़ी पर स्थित है. 

शांति का है स्वर्ग 

इस मंदिर को शांति का स्वर्ग कहा जाता है. यहां की शक्ति इंद्राक्षी और भैरव राक्षसेश्वर हैं. यहां माता शंकरी विराजामान हैं. मान्यता है कि यहां पर देवी को खुद रावण ने स्थापित किया था. इसके साथ ही यहां पर भगवान शिव का भी मंदिर है, इन्हें त्रिकोणेश्वर या कोणेश्वम कहा जाता है. यहां पर भगवान शिव और शक्ति का पूजन किया जाता है. इसको शिव-शक्ति के पूजन के लिए काफी खास जगह माना जाता है. 

माता सती के शरीर का गिरा था ये अंग 

इस स्थान पर माता सती के शरीर का उसंधि (पेट और जांघ के बीच का भाग) वाला हिस्सा गिरा था. इस कारण मंदिर को शक्तिपीठ कहा जाता है. वहीं कुछ ग्रंथों में इस जगह पर माता सती के कंठ और नुपुर के गिरने का उल्लेख किया गया है. 

आदि शंकराचार्य के 18 महाशक्तिपीठों में से एक है यह स्थान

इस स्थान का उल्लेख आदि शंकराचार्य द्वारा निश्चित 18 महाशक्तिपीठों में भी है. इतिहास में इस मंदिर पर कई बार हमले हो चुके हैं. इस कारण मंदिर का स्वरूप बदलता रहा है. इस मंदिर की प्रतिमा को हर बार बचाया गया है. 17वीं शताब्दी में पुर्तगाल आक्रमणकारियों ने इस मंदिर ध्वस्त कर दिया था. इसके बाद मंदिर में केवल एक स्तंभ ही बचा था. यहां पर दक्षिण भारत के तमिल चोल राजा कुलाकोट्टन ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था. वहीं, 1952 में श्रीलंका में रहने वाले तमिल हिंदू राजाओं ने इसको वर्तमान स्वरूप दिया. 

Disclaimer : यहां दी गई सभी जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है.  theindiadaily.com  इन मान्यताओं और जानकारियों की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह ले लें.