नई दिल्ली: सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे शुभ माना जाता है. इस वर्ष सावन की शुरुआत 30 जुलाई से हो रही है और इसका समापन 28 अगस्त को श्रावण पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन के दिन होगा. इस पूरे महीने में शिव भक्त जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक और रुद्राभिषेक कर भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. धार्मिक मान्यता है कि सावन में श्रद्धा और नियम के साथ की गई शिव पूजा से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में सुख, शांति तथा समृद्धि आती है.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के समय निकले विष को भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए अपने कंठ में धारण किया था. विष की तीव्रता को शांत करने के लिए माता पार्वती ने भगवान शिव का जलाभिषेक किया. तभी से सावन में भगवान शिव पर जल अर्पित करने और रुद्राभिषेक करने की परंपरा चली आ रही है. माना जाता है कि इस महीने में भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष कृपा भक्तों पर बनी रहती है.
यदि कोई भक्त विस्तृत पूजा नहीं कर सकता तो केवल एक बेलपत्र श्रद्धापूर्वक शिवलिंग पर अर्पित करना भी शुभ माना जाता है. यदि ताजा बेलपत्र उपलब्ध न हो तो मंदिर में चढ़ा हुआ बेलपत्र धोकर भी श्रद्धा से अर्पित किया जा सकता है. पूजा में सच्ची आस्था और भक्ति को सबसे अधिक महत्व दिया गया है.
रुद्राभिषेक के लिए सबसे पहले भगवान शिव का ध्यान करें. तांबे के पात्र में स्वच्छ जल भरकर उसे शिवलिंग पर पतली और निरंतर धारा के रूप में अर्पित करें. अभिषेक के दौरान शिव मंत्रों या रुद्र पाठ का जाप करना शुभ माना जाता है. इसके बाद शिवलिंग को स्वच्छ जल से स्नान कराकर फलों के रस, गन्ने के रस, शहद, घी, गंगाजल, काले तिल, चने की दाल, हल्दी, केसर और कुमकुम आदि से श्रद्धानुसार अभिषेक किया जा सकता है.
रुद्राभिषेक किसी भी दिन किया जा सकता है, लेकिन सावन के सोमवार, प्रदोष व्रत और महाशिवरात्रि का विशेष महत्व माना जाता है. कई विद्वान रुद्राभिषेक से पहले शिववास का विचार करने की भी सलाह देते हैं. इसके लिए किसी योग्य पुरोहित या विद्वान से मार्गदर्शन लिया जा सकता है.
रुद्राभिषेक घर और मंदिर दोनों स्थानों पर किया जा सकता है. हालांकि किसी प्राचीन शिव मंदिर, तीर्थ स्थल या पवित्र नदी के तट पर किया गया रुद्राभिषेक अधिक शुभ माना जाता है. यदि घर में विधिपूर्वक और श्रद्धा से पूजा की जाए तो उसका भी पूर्ण आध्यात्मिक महत्व माना गया है.