चैती छठ का महापर्व आज से शुरू, जानें अगले चार दिनों तक कब और कैसे की जाएगी पूजा?
हिंदू धर्म में छठ पूजा का विशेष महत्व है. आज से चैती छठ शुरू हो चुका है. अगले चार दिनों तक सख्त नियमों के साथ इस पर्व को मनाया जाएगा. आइए जानते हैं कि अगले चार दिनों क्या खास रहेगा.
छठ का त्योहार साल में दो बार मुख्य रूप से मनाया जाता है. एक बार दीवाली के बाद और दूसरा अभी चैत्र के महीने में, आज से चैती छठ पूजा शुरू हो चुकी है. इस चार दिवसीय पर्व को भक्ति, शुद्धता और परिवार की सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. व्रती इस पर्व में सूर्य भगवान की उपासना करती हैं और परिवार में सुख, संतान की लंबी उम्र और अच्छा स्वास्थ्य की कामना करती हैं.
छठ के पहले दिन यानी आज रविवार को 'नहाय-खाय' मनाया जा रहा है. आज के दिन व्रती महिलाएं सुबह स्नान कर शुद्धता का संकल्प लेती हैं. इसके बाद सात्विक भोजन ग्रहण किया जाता है. आज विशेष रूप से कद्दू की सब्जी के साथ चावल का प्रसाद खाया जाता है. परिवार के सभी सदस्य भी इस भोजन में शामिल होते हैं. इससे तन-मन की शुद्धि होती है और आगे के व्रत की तैयारी पूरी होती है.
क्या है पूरा नियम?
नहाय-खाय के अगले दिन यानी त्योहार के दूसरे दिन 'खरना' मनाया जाता. इस दिन व्रती पूरे दिन उपवास रखती हैं और शाम को ईख के रस, गुड़ से बनी खीर, पूड़ी, केला और अन्य सात्विक चीजों का नैवेद्य चढ़ाया जाता है. प्रसाद ग्रहण करने के बाद 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत शुरू हो जाता है. इस दौरान व्रती को पानी तक नहीं पीना होता है. यह व्रत उनकी भक्ति और धैर्य की परीक्षा लेता है.
इसके बाद तीसरे दिन को शाम के समय व्रती महिलाएं अपने आसपास के नदी या तालाब जाकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देती हैं. अगर पास में नदी या तालाब ना हो तो घर की छत पर ही पानी जमा कर के ऐसा कर सकती है. इसके लिए घर से सूप में फल, ठेकुआ, सुपारी आदि रखकर छठी मैया के गीत गाते हुए घाट तक जाना होता है.
बिहार और यूपी में खास मान्यता
छठ के चौथे दिन यानी बुधवार को अंतिम दिन है. इस दिन निकलते सूरज की पूजा की जाती है. प्रातःकाल की पहली किरणों के साथ व्रती अपना तप पूरा करती हैं. इसके बाद कच्चा दूध और फल ग्रहण कर व्रत का पारण होता है. परिवार की मंगलकामना के साथ पर्व संपन्न होता है. इस त्योहार को कार्तिक और चैत्र के महीने में मनाया जाता है. बिहार और यूपी में इस त्योहार को सबसे ज्यादा मनाया जाता है. भक्त इसे प्रकृति, सूर्य और मातृत्व की पूजा के रूप में बताते हैं.
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