बद्रीनाथ: उत्तराखंड के पावन बद्रीनाथ धाम में आज 23 अप्रैल गुरुवार को गंगा सप्तमी के शुभ मुहूर्त पर मंदिर के कपाट खोल दिए गए. सुबह मंत्रोच्चार और जयकारों के साथ जब विशाल कपाट खुले तो भक्तों का उत्साह देखते ही बन रहा था. पांच शुभ योगों-सुकर्मा, धृति, सर्वार्थ सिद्धि, गुरु पुष्य और अमृत सिद्धि योग में यह पावन क्षण और भी खास हो गया.
चारधाम यात्रा के बिना बद्रीनाथ के दर्शन अधूरे माने जाते हैं. भगवान विष्णु यहां बद्रीविशाल रूप में विराजमान हैं. इस धाम की अपनी कई अनोखी मान्यताएं और रोचक कथाएं हैं, जो भक्तों को बार-बार यहां खींच लाती हैं. आज हम आपको बद्रीनाथ धाम और भगवान बद्रीविशाल से जुड़ी कुछ खास बातें बताते हैं.
बद्रीनाथ धाम में भगवान विष्णु स्वयं बद्रीविशाल के रूप में विराजमान हैं. गर्भगृह में उनके साथ माता लक्ष्मी, उद्धव जी और धनपति कुबेर भी मौजूद रहते हैं. इसीलिए इस मंदिर को बदरीनारायण मंदिर भी कहा जाता है. भक्त यहां योग मुद्रा में विराजित भगवान के दर्शन करते हैं.
कथा है कि माता लक्ष्मी रूठकर बैकुंठ छोड़ गईं. भगवान विष्णु बदरी वनों में तपस्या करने लगे. जब लक्ष्मी जी यहां पहुंचीं तो उन्होंने बदरी के पेड़ के नीचे तपस्या करते विष्णु को देखा. बदरी का अर्थ बेर का फल है. तभी लक्ष्मी जी ने उन्हें बद्रीनाथ कहा. धाम का अर्थ है निवास स्थान.
बद्रीनाथ को भू-वैकुंठ कहा जाता है. यह अलकनंदा नदी के किनारे नर और नारायण पर्वतों के बीच स्थित है. भगवान विष्णु ने यहां नर-नारायण रूप में तपस्या की थी. द्वापर युग में अर्जुन नर रूप और श्रीकृष्ण नारायण रूप में यहां अवतरित हुए थे.
सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण मंदिर के कपाट 6 महीने बंद रहते हैं. बंद होने से पहले एक अखंड दीपक जलाया जाता है. 6 महीने बाद जब कपाट खोले जाते हैं तो वह दीपक अभी भी जलता मिलता है. मान्यता है कि इस दौरान देवता भगवान की पूजा करते हैं.
एक लोकप्रिय कहावत है-'जो जाए बदरी, वो न आए ओदरी'. इसका अर्थ है कि बद्रीनाथ दर्शन करने वाला व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर लेता है और उसे फिर माता के गर्भ में नहीं आना पड़ता. यह कहावत बद्रीनाथ धाम की महिमा को दर्शाती है.
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