26 जुलाई 1999 भारत के लिए सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि वो दिन है जब हमारी सेना ने अदम्य साहस, अटूट संकल्प और सर्वोच्च बलिदान के साथ इतिहास रच दिया. कारगिल विजय दिवस हर साल हमें याद दिलाता है कि देश की सीमाएं सिर्फ नक्शों से नहीं, बल्कि जवानों के लहू से सुरक्षित रहती हैं.
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विक्रम बत्रा – 'ये दिल मांगे मोर' नहीं, वीरता मांगे और दी भी
कैप्टन विक्रम बत्रा ने पॉइंट 5140 और 4875 पर जान की बाज़ी लगाकर बेजोड़ नेतृत्व किया. उनकी बहादुरी सिर्फ युद्ध मैदान तक सीमित नहीं रही, बल्कि हर देशवासी के दिल तक पहुँच गई. उनका बलिदान राष्ट्र के लिए अमर प्रेरणा बन गया.
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योगेंद्र सिंह यादव – गोलियों से छलनी, पर हौसले से अडिग
कंधे और पेट में गोलियां लगने के बावजूद टाइगर हिल पर चढ़ते हुए दुश्मनों के बंकरों को तबाह करने वाले ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव की कहानी अकल्पनीय साहस की मिसाल है.
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संजय कुमार – अकेले लड़कर दुश्मनों की मशीनगन छीन ली
राइफलमैन संजय कुमार ने दुश्मन के बंकर में घुसकर आमने-सामने की लड़ाई में उन्हें पछाड़ा, और घायल होने के बावजूद उनकी ही मशीनगन से पलटवार किया. उनकी वीरता टुकड़ी को जीत दिलाने वाली साबित हुई.
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क्लिफोर्ड नोंग्रुम – 'अगर मरूंगा तो एक सैनिक की तरह'
मेघालय के इस वीर ने बटालिक सेक्टर में शौर्य की नई परिभाषा लिखी. गोलियों के बीच लड़ते हुए उन्होंने अंतिम सांस तक मोर्चा नहीं छोड़ा. पूर्वोत्तर का यह बेटा आज भी सैल्यूट के काबिल है.
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विजयंत थापर – 22 साल की उम्र, लेकिन जज़्बा लाजवाब
सिर्फ 22 साल के कैप्टन विजयंत ने नोल पर दुश्मन के कई बंकर तबाह किए. उनका परिवार को लिखा अंतिम पत्र हर भारतीय को रुला देता है. उनकी कहानी देशभक्ति की सबसे पवित्र मिसाल है.
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विवेक गुप्ता – घायल होकर भी हमले की अगुवाई की
तोलोलिंग पर रात के हमले में कैप्टन विवेक गुप्ता ने नेतृत्व किया और अंतिम सांस तक लड़ते रहे. उनके पराक्रम से दुश्मन के अहम ठिकाने ध्वस्त हुए और विजय का मार्ग प्रशस्त हुआ.
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राजेश अधिकारी – खुली जमीन में साहस का तूफान
मेजर राजेश अधिकारी ने तोलोलिंग पर अपने जवानों के लिए ढाल बनते हुए दुश्मन के बंकर तक पहुंचकर हमला किया. उनकी रणनीति और बलिदान ने निर्णायक जीत दिलाई.
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अनुज नैयर – रॉकेट से पहले बंकर खत्म कर दिया
पिंपल II पर कैप्टन अनुज नैयर ने तीन बंकरों को तबाह किया और चौथा भी नष्ट किया, लेकिन तभी रॉकेट से हमला हुआ. उनका बलिदान उनकी यूनिट को मिशन में सफलता दिलाने का कारण बना.
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मनोज पांडे – 'अगर मैं वापस न लौटूं...'
खालूबार रिज पर कैप्टन मनोज पांडे ने घायल होने के बावजूद लगातार बंकर ध्वस्त किए. उनके शब्द थे: 'अगर मैं वापस न लौटूं, तो बताना कि मैंने देश के लिए जान दी.'