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इस रहस्यमयी मंदिर में भूख से सूख जाते हैं भगवान, ग्रहण काल में भी लगता है प्रभु को भोग

भारत के केरल राज्य के थिरुवरप्पु में स्थित भगवान श्रीकृष्ण का एक 1500 साल पुराना मंदिर हैं, यहां भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति दिन में 10 बार भोग लगाया जाता है. अगर भोग में विलंब होता है तो प्रभु दुबले होने लगते हैं. उनको भूख सहन नहीं होती है.

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भारत के केरल राज्य के थिरुवरप्पु में स्थित भगवान श्रीकृष्ण का एक 1500 साल पुराना मंदिर हैं, यहां भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति दिन में 10 बार भोग लगाया जाता है. अगर भोग में विलंब होता है तो प्रभु दुबले होने लगते हैं. उनको भूख सहन नहीं होती है. 

केरल राज्य के थिरुवरप्पु के इस श्रीकृष्ण मंदिर को ग्रहण के दिन भी बंद नहीं किया जाता है. आदिशंकराचार्य ने खुद इस मंदिर को ग्रहण काल में बंद न करने का आदेश दिया था, क्योंकि ग्रहण काल में भोग न लगने से भगवान श्रीकृष्ण का विग्रह दुबला हो जाता है. यह मंदिर 24 घंटे में मात्र 2 मिनट के लिए ही बंद होता है. मंदिर दिन में 11:58 पर बंद होता है और 12:00 खोल दिया जाता है. इस मंदिर के पुजारी को ताले के साथ कुल्हाड़ी भी दी  गई है. अगर ताला खोलने में विलंब हो तो कुल्हाड़ी से ताला तोड़ दिया जाता है. भगवान 2 मिनट ही नींद लेते हैं. 

भगवान श्रीकृष्ण को दिन में 10 बार नैवेद्य अर्पित किया जाता है. यहां आने वाले हर भक्त को भी प्रसाद दिया जाता है. यहां से बिना प्रसाद लिए भक्त को जाने की अनुमति नहीं होती है. मान्यता है कि इस मंदिर का प्रसाद जो भी व्यक्ति खाता है, वह जीवन में कभी भी भूखा नहीं रहता है. मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण यहां पर प्लेट में थोड़ा-थोड़ा नैवेद्य खाकर खत्म कर देते हैं.

मान्यता है कि वनवास के दौरान पांडव भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति का पूजन किया करते थे और उनको भोग लगाते थे. उनका वनवास यहीं तिरुवरप्पु में खत्म हुआ तो मछुआरों ने उनसे भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति को यही पर छोड़ जाने को कहा गया. मछुवारों ने वहां पर ग्राम देवता के रूप में भगवान श्रीकृष्ण को पूजन किया. जब वे संकटों से घिरे तो वहां के ज्योतिषीयों ने बताया कि वे मूर्ति की सही तरीके पूजा नहीं कर पा रहे हैं. इस पर उन्होंने मूर्ति को समुद्री झील में प्रवाहित कर दिया. 

कई सालों बाद केरल के एक ऋषि विल्वमंगलम स्वामीयार नाव में यात्रा कर रहे थे तो उनकी नाव एक जगब पर अटक गई. उन्होंने देखा कि नाव के नीचे एक मूर्ति है. उन्होंने मूर्ति को बाहर निकाला और उन्होंने मूर्ति को एक पेड़ के नीचे रख दिया. इसके बाद मूर्ति वहां से नहीं हिली. इस कारण इस मूर्ति को वहीं प्रतिष्ठित कर दिया गया.