देशभर में 7 फरवरी को ओला, ऊबर और रैपिडो ड्राइवर्स की हड़ताल, जानें आखिर क्या है मांग?
कल यानी शनिवार को ओला, ऊबर या रैपिडो से सफर करने वालों लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. जी हां दरअसल देशभर में कल न प्लेटफार्म से जुड़े ड्राइवर्स ने हड़ताल का ऐलान किया है.
नई दिल्ली: देशभर में ऊबर, ओला, रैपिडो और अन्य ऐप बेस्ड राइड हेलिंग सेवाओं के ड्राइवर 7 फरवरी 2026 (शनिवार) को राष्ट्रव्यापी हड़ताल पर जा रहे हैं. इसे 'ऑल इंडिया ब्रेकडाउन' नाम दिया गया है. इस दौरान ड्राइवर कम से कम 6 घंटे (सुबह 6 बजे से दोपहर 12 बजे तक) अपने ऐप ऑफलाइन रखेंगे और राइड्स नहीं लेंगे. इससे दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई जैसे बड़े शहरों में यात्रियों को काफी मुश्किल हो सकती है.
देशभर में 7 फरवरी को ओला, ऊबर और रैपिडो ड्राइवर्स की हड़ताल
कैब, ऑटो-रिक्शा और बाइक टैक्सी सेवाएं बुरी तरह प्रभावित रहेंगी. यह हड़ताल तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन के नेतृत्व में हो रही है, जिसे कई राष्ट्रीय श्रमिक संगठनों का समर्थन मिला है. यूनियन ने केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को पत्र लिखकर अपनी मांगें रखी हैं. ड्राइवरों का आरोप है कि वे लंबे समय से शोषण का शिकार हैं. ऐप कंपनियां मनमाने ढंग से किराया तय करती हैं, जिससे उनकी कमाई अनिश्चित और कम हो गई है.
लाखों ड्राइवर आर्थिक संकट में हैं, जबकि कंपनियां मुनाफा कमा रही हैं. ड्राइवरों की मुख्य मांगें इस प्रकार हैं:-
न्यूनतम बेस किराया अधिसूचित किया जाए: केंद्र और राज्य सरकारें तुरंत ऐप-बेस्ड सेवाओं (कैब, ऑटो, बाइक टैक्सी) के लिए न्यूनतम बेस फेयर तय करें. यह ड्राइवर यूनियनों से चर्चा के बाद हो और 2025 के मोटर व्हीकल एग्रीगेटर गाइडलाइंस के अनुसार लागू हो.
निजी वाहनों का कमर्शियल इस्तेमाल बंद हो: नॉन-कमर्शियल (प्राइवेट) वाहनों को कमर्शियल राइड्स के लिए इस्तेमाल पर सख्त रोक लगे या उन्हें कमर्शियल कैटेगरी में बदलना जरूरी हो. मोटर व्हीकल एक्ट और एग्रीगेटर नियमों के तहत कार्रवाई हो.
क्लॉज 17.3 हटाया जाए: मोटर व्हीकल एग्रीगेटर गाइडलाइंस में क्लॉज 17.3 कंपनियों को बेस फेयर से 50% तक कम किराया रखने की छूट देता है. इसे हटाया जाए, क्योंकि इससे ड्राइवरों की आय प्रभावित होती है.
बेहतर कार्य स्थिति और सुरक्षा: ड्राइवरों के लिए उचित काम के घंटे, बीमा, सामाजिक सुरक्षा और मजबूत नियम लागू हों.
यूनियन का कहना है कि कोई तय सरकारी किराया सिस्टम न होने से ड्राइवरों का शोषण हो रहा है. कंपनियां किराया घटाकर यात्रियों को आकर्षित करती हैं, लेकिन नुकसान ड्राइवरों का होता है. अगर मांगें नहीं मानी गईं, तो आगे बड़े आंदोलन की चेतावनी भी दी गई है.