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हर कर्मचारी को लिखित ऑफर लेटर, सैलरी, काम के घंटे...सड़कों पर उतरे कर्मचारी, जानें न्यू लेबर कोड में क्या-क्या?

नोएडा और फरीदाबाद में सैलरी बढ़ोतरी को लेकर चल रहे प्रदर्शन ने एक बार फिर श्रमिकों की समस्याओं को उजागर कर दिया है. दिल्ली-एनसीआर के इन औद्योगिक इलाकों में हजारों कर्मचारी पिछले कई दिनों से सड़कों पर हैं. वे उचित वेतन वृद्धि, समय पर सैलरी और बेहतर काम की स्थिति की मांग कर रहे हैं. 

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Antima Pal

नोएडा: नोएडा और फरीदाबाद में सैलरी बढ़ोतरी को लेकर चल रहे प्रदर्शन ने एक बार फिर श्रमिकों की समस्याओं को उजागर कर दिया है. दिल्ली-एनसीआर के इन औद्योगिक इलाकों में हजारों कर्मचारी पिछले कई दिनों से सड़कों पर हैं. वे उचित वेतन वृद्धि, समय पर सैलरी और बेहतर काम की स्थिति की मांग कर रहे हैं. 

सोमवार को कुछ जगहों पर प्रदर्शन उग्र हो गया, जिसमें तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं भी हुईं. कर्मचारियों की शिकायत है कि छोटी-बड़ी फैक्टरियों में उन्हें महंगाई के मुताबिक सैलरी नहीं मिल रही. कई जगहों पर 9000 से 13,000 रुपये महीना ही मिलता है, जबकि काम 12 घंटे का होता है. वे हरियाणा जैसी सैलरी की मांग कर रहे हैं. साथ ही ओवरटाइम का सही भुगतान, साप्ताहिक छुट्टी और बोनस भी चाहते हैं.

नया लेबर कोड क्या कहता है?

देश में नवंबर 2025 से चार नए श्रम संहिता (लेबर कोड) लागू हो चुके हैं. इनमें पुराने 29 कानूनों को सरल बनाया गया है. मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना और पारदर्शिता लाना है. खासकर छोटी फैक्टरियों और असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए ये राहत देने वाले हैं. 

अब जुबानी वादा नहीं चलेगा:-

नए कोड के तहत हर कर्मचारी को लिखित ऑफर लेटर या नियुक्ति पत्र देना अनिवार्य है. इसमें सैलरी, काम के घंटे, पद और अन्य शर्तें साफ लिखी होंगी. इससे धोखाधड़ी रुकेगी और कानूनी अधिकार मजबूत होंगे.

समय पर सैलरी मिलना जरूरी:-  

दैनिक मजदूरी वाले को उसी दिन, साप्ताहिक को सप्ताह के आखिरी दिन, मासिक को अगले महीने के सातवें दिन तक सैलरी देनी होगी.

नौकरी छोड़ने या निकाले जाने पर दो कामकाजी दिनों में पूरा बकाया चुकाना होगा.

देरी पर नियोक्ता पर जुर्माना लग सकता है.

काम के घंटों का सख्त हिसाब:-

एक दिन में सामान्य काम 8 घंटे और हफ्ते में 48 घंटे. इससे ज्यादा ओवरटाइम पर दोगुना वेतन देना होगा. छोटी फैक्टरियों में भी ये नियम लागू हैं. 

छोटी फैक्टरियों में काम करने वालों को राहत:-

सभी कर्मचारियों (संगठित या असंगठित) के लिए न्यूनतम वेतन अनिवार्य है. केंद्र सरकार राष्ट्रीय फ्लोर वेज तय करेगी, राज्य उससे कम नहीं रख सकेंगे. न्यूनतम वेतन कौशल, क्षेत्र और जीवन-यापन के खर्च को देखकर तय होगा. इससे छोटे कारखानों में भी मजदूरों को सम्मानजनक आय मिलेगी.

महिलाओं के लिए सुरक्षित और बराबरी का माहौल:-  

लैंगिक भेदभाव पूरी तरह प्रतिबंधित. समान काम के लिए समान वेतन.

महिलाएं रात की शिफ्ट में काम कर सकती हैं, लेकिन उनकी सहमति जरूरी. सुरक्षा के पूरे इंतजाम जैसे सुरक्षित परिवहन, अच्छी रोशनी और महिला सुपरवाइजर होना चाहिए.

क्रेच सुविधा या बच्चे की देखभाल भत्ता भी प्रावधान में है.

नए लेबर कोड में सामाजिक सुरक्षा, ग्रेच्युटी, स्वास्थ्य जांच और सुरक्षित कार्यस्थल जैसे मुद्दों पर भी जोर है. फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट में भी स्थायी कर्मचारियों जैसी सुविधाएं मिलेंगी.

फिर प्रदर्शन क्यों?

कानून भले ही कर्मचारियों के पक्ष में हों, लेकिन कई छोटी इकाइयों में अभी भी पुरानी आदतें बनी हुई हैं. कुछ मालिक नियमों की अनदेखी करते हैं, सैलरी कम दिखाते हैं या ओवरटाइम नहीं देते. श्रम विभाग की निगरानी बढ़ाने और जागरूकता फैलाने की जरूरत है.

सरकार का कहना है कि नए कोड से रोजगार औपचारिक बनेगा और मजदूरों को मजबूत अधिकार मिलेंगे. लेकिन एनसीआर जैसे इलाकों में इसे जमीन पर उतारने के लिए सख्त अमल जरूरी है. कर्मचारियों को सलाह है कि अपनी मांगें शांतिपूर्ण तरीके से रखें और कानूनी रास्ता अपनाएं.